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"Dharam" Barot
ro chuka hooñ jitna rona tha mujhe
ro chuka hooñ jitna rona tha mujhe | रो चुका हूँ जितना रोना था मुझे
- "Dharam" Barot
रो
चुका
हूँ
जितना
रोना
था
मुझे
आपका
अब
फिर
से
होना
था
मुझे
बस
यही
उम्मीद
में
दिन
गुज़रे
हैं
सामने
हो
आप
खोना
था
मुझे
आसमाँ
में
उड़ना
था
कुछ
वक़्त
तक
फिर
ज़मीं
पर
धान
बोना
था
मुझे
शोर
से
थक
जाता
था
महफ़िल
कि
जब
लगता
प्यारा
एक
कोना
था
मुझे
रंज-ओ-ग़म
देना
नहीं
फ़ितरत
मेरी
ख़ुद
ही
ख़ुद
के
पास
रोना
था
मुझे
- "Dharam" Barot
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फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल
न
पूछिए
'मजरूह'
शराब
एक
है
बदले
हुए
हैं
पैमाने
Majrooh Sultanpuri
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एक
महफ़िल
में
कई
महफ़िलें
होती
हैं
शरीक
जिस
को
भी
पास
से
देखोगे
अकेला
होगा
Nida Fazli
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तिरे
बग़ैर
अजब
बज़्म-ए-दिल
का
आलम
है
चराग़
सैंकड़ों
जलते
हैं
रौशनी
कम
है
Shakeel Badayuni
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मुझे
तो
होश
न
था
उन
की
बज़्म
में
लेकिन
ख़मोशियों
ने
मेरी
उन
से
कुछ
कलाम
किया
Behzad Lakhnavi
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ख़ुशबू
से
किस
ज़बान
में
बातें
करेंगे
लोग
महफ़िल
में
ये
सवाल
तुझे
देख
कर
हुआ
Mansoor Usmani
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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तेरे
होते
हुए
महफ़िल
में
जलाते
हैं
चराग़
लोग
क्या
सादा
हैं
सूरज
को
दिखाते
हैं
चराग़
Ahmad Faraz
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मोहब्बत
करने
वाले
कम
न
होंगे
तिरी
महफ़िल
में
लेकिन
हम
न
होंगे
Hafeez Hoshiarpuri
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पहले
थोड़ी
मुश्किल
होगी
आगे
लेकिन
मंज़िल
होगी
सब
बाराती
शायर
होंगे
मेरी
शादी
महफ़िल
होगी
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Tanoj Dadhich
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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ये
बच्चे
प्यार
भी
पाते
थे
पहले
ये
बच्चे
मार
भी
खाते
थे
पहले
नहीं
तैयार
बेटी
मानने
को
की
टीवी
बॉक्स
से
आते
थे
पहले
चले
जाओ
ये
घर
को
छोड़
कर
तुम
नहीं
घर
छोड़
के
जाते
थे
पहले
नहीं
था
फोन
बैठाने
को
बच्चे
तभी
हम
खेलते
खाते
थे
पहले
थी
थोड़ी
सैलरी
कम
पर
पिताजी
मिठाई
असली
ले
आते
थे
पहले
तुम्हें
जिस
से
एलर्जी
हो
रही
है
ज़मीं
पर
बैठ
कर
खाते
थे
पहले
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"Dharam" Barot
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लफ्ज़
से
है
चोट
लगती
है
हुनर
रिश्ता
निभाना
"Dharam" Barot
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क्यूँ
तुम्हें
कुछ
भी
छुपाना
इश्क़
में
मत
किसी
को
आज़माना
इश्क़
में
दो
की
बातों
को
रखे
दो
तक
ही
आप
क्यूँ
किसी
को
कुछ
बताना
इश्क़
में
रुक्मिणी
भी
और
राधा
भी
हो
तुम
अब
करो
कान्हा
ओ
कान्हा
इश्क़
में
रात
भर
बातों
से
वो
थकती
नहीं
अच्छा
लगता
है
जगाना
इश्क़
में
उसकी
हाँ
धोका
भी
हो
सकता
था
यार
सो
किसी
को
मत
जलाना
इश्क़
में
छोड़
कर
जाना
मुझे
सब
कल
धरम
आज
को
ही
था
मनाना
इश्क़
में
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मेरी
हर
साँस
पर
है
नाम
तेरा
ही
भजा
है
नाम
हर
पल
राम
तेरा
ही
किया
अनजान
बन
के
वार
तूने
दोस्त
मगर
मैं
जानता
ये
काम
तेरा
ही
बदलती
है
ये
दुनिया
रंग
हर
दिन
ही
लगा
ख़ुद
अपना
अच्छा
दाम
तेरा
ही
गणित
हर
कर्म
का
धीरे
से
हो
जाता
बुरा
अच्छा
जो
भी
अंजाम
तेरा
ही
तेरी
आवाज़
सुन
के
आ
गया
हूँ
पर
लगा
होंठों
से
ख़ुद
तू
जाम
तेरा
ही
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हो
जब
सरकार
भी
क़ुदरत
की
मोहताज
बनी
पब्लिक
भी
तब
रहमत
की
मोहताज
नहीं
होती
ख़ुशी
दौलत
की
मोहताज
हो
जाती
है
ख़ुशी
क्यूँ
लत
की
मोहताज
बनाया
एक
घर
इंसान
ने
जब
थी
चिड़िया
पिंजरे
में
पर
छत
की
मोहताज
नई
सरकार
में
पेपर
हुए
लीक
नई
है
तो
नहीं
है
मत
की
मोहताज
कहो
मत
कुछ
भी
घूमों
साल
भर
पास
वो
आहिस्ता
से
होगी
ख़त
की
मोहताज
हो
अच्छे
काम
थोड़े
आप
से
भी
धरम
तक़दीर
भी
बरकत
की
मोहताज
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