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"Dharam" Barot
dukhi logon ka dukh kab kaun samjhe
dukhi logon ka dukh kab kaun samjhe | दुखी लोगों का दुख कब कौन समझे
- "Dharam" Barot
दुखी
लोगों
का
दुख
कब
कौन
समझे
वही
मेरा
जो
मेरा
मौन
समझे
नहीं
है
डर
नहीं
है
कोई
सम्मान
कहाँ
से
बैअत-ए-फ़िरऔन
समझे
समझकर
भी
रुके
इस
बात
पर
हम
ये
दोनों
में
से
पहले
कौन
समझे
अकेलापन
अकेले
झेलना
था
अकेलेपन
का
आलम
कौन
समझे
नवाज़ा
था
हुनर
से
उस
ख़ुदा
ने
किसी
को
भी
धरम
क्यूँ
गौन
समझे
- "Dharam" Barot
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इंसान
अच्छा
या
बुरा
हो
सकता
है
पर
सोच
से
हर
इक
जुदा
हो
सकता
है
सबके
लिए
अच्छा
हो
ऐसा
शख़्स
भी
मेरे
लिए
थोड़ा
बुरा
हो
सकता
है
जब
हो
ज़रूरत
सच्ची
फिर
तुम
देखना
इंसान
भी
इंसान
सा
हो
सकता
है
औरों
के
कहने
पर
बुरा
मत
मानना
वो
शख़्स
सच
में
काम
का
हो
सकता
है
हर
बात
पर
देना
सफ़ाई
अच्छा
क्या
रख
कर
भरोसा
आपका
हो
सकता
है
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परायों
पर
कभी
भी
वार
कर
पाते
नहीं
जो
लोग
बनाकर
गोडसे
अपनों
को
ही
हैं
मारते
वो
लोग
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मलाल-ए-इश्क़
को
ताज़ा
किया
जाए
नया
सा
इश्क़
का
फ़रमा
बुना
जाए
मिलाए
आँखें
फिर
इक
दूसरे
से
आप
सलाम-ए-इश्क़
का
आगाज़
आ
जाए
मिली
है
ज़िंदगी
फिर
से
नई
देखो
कलाम-ए-इश्क़
को
फिर
से
पिया
जाए
चली
ऐसे
पलटकर
फिर
न
आई
वो
किताब
-ए-इश्क़
को
फिर
से
जिया
जाए
न
आए
लौट
कर
अब
पास
कोई
भी
धरम
को
धर्म
के
पथ
पर
रखा
जाए
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उम्मीद
भी
नाराज़गी
बन
जाती
है
अपना
किसी
को
मानना
धोखा
है
क्या?
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औरों
ने
जी
भर
किया
बर्बाद
मुझको
आप
ही
से
होना
था
आबाद
मुझको
हिज्र
का
कोई
इरादा
भी
नहीं
है
क़ैद
करके
मत
करे
आज़ाद
मुझको
बंदगी
इक
नाम
की
करता
रहूँगा
इश्क़
में
इक
दिन
मिलेगी
दाद
मुझको
वास्ते
हाज़िर
रहूँगा
आप
के
मैं
आप
कर
सकते
कभी
भी
याद
मुझको
मेरी
ग़ज़लों
को
जभी
वो
गुनगुनाती
लग
रहा
था
दे
रही
है
साद
मुझको
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