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"Dharam" Barot
do qadam ka bhi sahaara tha bahut
do qadam ka bhi sahaara tha bahut | दो क़दम का भी सहारा था बहुत
- "Dharam" Barot
दो
क़दम
का
भी
सहारा
था
बहुत
दो
क़दम
में
भी
निभाना
था
बहुत
ज़िंदगी
इस
सेे
ज़ियादा
भी
नहीं
हाँ
मगर
इस
में
तमाशा
था
बहुत
लेके
कोई
चीज़
जानी
भी
नहीं
फिर
भी
सब
को
ही
दिखाना
था
बहुत
कहता
हूँ
कोई
नहीं
मेरा
यहाँ
कहके
अपनों
से
जताना
था
बहुत
हो
न
हो
परवाह
ये
देखे
बिना
कहते
रहना
है
हमारा
था
बहुत
बोलता
अच्छा
नहीं
लगता
उन्हें
गूँगा
होकर
के
सुनाना
था
बहुत
- "Dharam" Barot
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दुख
की
दीमक
अगर
नहीं
लगती
ज़िन्दगी
किस
क़द्र
हसीं
लगती
वस्ल
को
लॉटरी
समझता
हूँ
लॉटरी
रोज़
तो
नहीं
लगती
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Azbar Safeer
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अब
ज़िन्दगी
से
कोई
मिरा
वास्ता
नहीं
पर
ख़ुद-कुशी
भी
कोई
सही
रास्ता
नहीं
Rahul
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बस
एक
मोड़
मिरी
ज़िंदगी
में
आया
था
फिर
इस
के
बाद
उलझती
गई
कहानी
मेरी
Abbas Tabish
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ग़म-ए-हयात
में
यूँँ
ढह
गया
नसीब
का
घर
कि
जैसे
बाढ़
में
डूबा
हुआ
गरीब
का
घर
वबायें
आती
गईं
और
लोग
मरते
गए
हमारे
गाँव
में
था
ही
नहीं
तबीब
का
घर
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Ashraf Ali
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ज़िंदगी
ज़िंदा-दिली
का
है
नाम
मुर्दा-दिल
ख़ाक
जिया
करते
हैं
Imam Bakhsh Nasikh
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तुम्हारी
मौत
मेरी
ज़िंदगी
से
बेहतर
है
तुम
एक
बार
मरे
मैं
तो
बार
बार
मरा
Zubair Ali Tabish
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ज़िंदगी
मेरी
मुझे
क़ैद
किए
देती
है
इस
को
डर
है
मैं
किसी
और
का
हो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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जान
भी
अब
दिल
पे
वारी
जाएगी
ये
बला
सर
से
उतारी
जाएगी
एक
पल
तुझ
बिन
गुज़रना
है
कठिन
ज़िन्दगी
कैसे
गुज़ारी
जाएगी
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Anjum Rehbar
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हाए
क्या
दौर-ए-ज़िंदगी
गुज़रा
वाक़िए
हो
गए
कहानी
से
Gulzar Dehlvi
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धूप
में
निकलो
घटाओं
में
नहा
कर
देखो
ज़िंदगी
क्या
है
किताबों
को
हटा
कर
देखो
Nida Fazli
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शहर
के
कोने
में
थे
हम
गाँव
बनकर
पेड़
जैसे
जीना
होगा
छाँव
बनकर
"Dharam" Barot
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सेठ
अनपढ़
नेता
अनपढ़
ये
कहानी
है
बताई
देश
में
ऐसी
पढ़ाई
की
दशा
किसने
बनाई
"Dharam" Barot
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हवा
तो
बस
बहाना
है
दिया
बुझने
ही
वाला
था
अमर
कोई
नहीं
सब
कुछ
यहाँ
पर
छोड़
जाना
था
लगाई
थी
किसी
अनजान
ने
आवाज़
तो
देखा
दिखा
था
सिर्फ़
साया
साथ
जो
चलने
ही
वाला
था
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"Dharam" Barot
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वो
नादाँ
है
उसे
मेरे
अलावा
दुनिया
दिखती
है
मैं
पागल
हूँ
मुझे
उसके
अलावा
कुछ
नहीं
दिखता
"Dharam" Barot
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ये
बच्चे
प्यार
भी
पाते
थे
पहले
ये
बच्चे
मार
भी
खाते
थे
पहले
नहीं
तैयार
बेटी
मानने
को
की
टीवी
बॉक्स
से
आते
थे
पहले
चले
जाओ
ये
घर
को
छोड़
कर
तुम
नहीं
घर
छोड़
के
जाते
थे
पहले
नहीं
था
फोन
बैठाने
को
बच्चे
तभी
हम
खेलते
खाते
थे
पहले
थी
थोड़ी
सैलरी
कम
पर
पिताजी
मिठाई
असली
ले
आते
थे
पहले
तुम्हें
जिस
से
एलर्जी
हो
रही
है
ज़मीं
पर
बैठ
कर
खाते
थे
पहले
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"Dharam" Barot
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