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Chetan
aakhirsh tees ka bharam toota
aakhirsh tees ka bharam toota | आख़िरश टीस का भरम टूटा
- Chetan
आख़िरश
टीस
का
भरम
टूटा
अब
कि
वो
चोट
नईं
कि
चीखें
हम
- Chetan
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रात
को
फिर
ज़िलों
ने
घेरा
है
हमको
कुछ
बुज़दिलों
ने
घेरा
है
कब
तेरे
सद
में
से
निकल
पाए
बस
नई
मुश्किलों
ने
घेरा
है
उसको
गहराई
से
नहीं
मतलब
उसको
बस
साहिलों
ने
घेरा
है
रात
के
साथ
हम
अकेले
थे
सुब्ह
को
ग़ाफ़िलों
ने
घेरा
है
आख़िरश
भूल
जाते
हैं
किस
ग़म
ने
हम
परेशाँ-दिलों
को
घेरा
है
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इन
हसीनों
को
दिल
दिया
होता
कोई
तुझ
सेा
हमें
दिखा
होता
नाम
उसका
अगर
ख़ुदा
होता
तेरे
आगे
भी
मैं
झुका
होता
मेरे
घर
की
घड़ी
पुरानी
है
शोर
यादों
का
भी
बड़ा
होता
तुम
समुंदर
को
छोड़
आए
हो
उसको
आँखों
में
भर
लिया
होता
जो
किताबें
पढ़ीं
नहीं
होती
ये
क़लम
ज़ो'म
से
चला
होता
जा
चुका
था
जो
जाने
से
पहले
जाने
के
बाद
तो
जुदा
होता
रंग
ख़ामोश
थे
सभी
मेरे
रंग
काला
न
जो
भरा
होता
जो
मेरा
दस्तरस
मिटा
सकता
जाम
मुझको
वो
ही
दिया
होता
था
सही
कोई
था
ग़लत
कोई
कोई
अपना
हमें
मिला
होता
गाँव
में
जो
सड़क
बनी
होती
घर
न
खंडर
कभी
बना
होता
जान
दे
कर
बुलाया
था
तुझको
जान
कर
ये
तो
रो
लिया
होता
रोज़
ये
रात
नोचती
उसको
बस
ग्राहक
कोई
नया
होता
तेरा
तिनका
मुझे
बचा
लेता
और
फिर
उम्र
भर
चुभा
होता
शाम
उस
रोज़
बस
नहीं
होती
उम्र
भर
साथ
तू
रहा
होता
है
जुदाई
नशा
मोहब्बत
का
जो
न
चढ़ता
तो
फिर
गिला
होता
ख़ैरियत
पूछ
कर
गया
है
वो
जो
न
जाता
तो
सब
भला
होता
जिस
तरह
याद
कर
रहा
है
तू
मैं
न
मरता
तो
मर
गया
होता
जो
मिले
रोज़
वो
बुरी
आदत
जो
मिले
कम
वो
ही
दवा
होता
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जिस्म
का
रिश्ता
था
अगर
तुझ
सेे
क्यूँ
बदन
से
न
ख़ून
सा
निकला
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साँसें
बढ़ती
थी
पास
आते
ही
तेरी
फ़ुर्क़त
में
मरना
वाजिब
है
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जिनको
छोड़ा
था
फिर
मिले
उन
सेे
सबको
मौक़ा
दिया
हमें
छोड़ें
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