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Ashutosh Kumar "Baagi"
us ne apne baal kaate haaye re kuchh yuñ laga
us ne apne baal kaate haaye re kuchh yuñ laga | उस ने अपने बाल काटे हाए रे कुछ यूँँ लगा
- Ashutosh Kumar "Baagi"
उस
ने
अपने
बाल
काटे
हाए
रे
कुछ
यूँँ
लगा
ज़िन्दगी
से
कोई
मेरी,
साल
जैसे
काट
दे
- Ashutosh Kumar "Baagi"
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आएगा
वो
दिन
हमारी
ज़िंदगी
में
भी
ज़रूर
जो
अँधेरों
को
मिटा
कर
रौशनी
दे
जाएगा
Anwar Taban
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कटती
है
आरज़ू
के
सहारे
पे
ज़िंदगी
कैसे
कहूँ
किसी
की
तमन्ना
न
चाहिए
Shaad Arfi
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मौत
ही
इंसान
की
दुश्मन
नहीं
ज़िंदगी
भी
जान
ले
कर
जाएगी
Arsh Malsiyani
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मैं
रोज़
रात
यही
सोच
कर
तो
सोता
हूँ
कि
कल
से
वक़्त
निकालूँगा
ज़िन्दगी
के
लिए
Swapnil Tiwari
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ज़िंदगी
एक
फ़न
है
लम्हों
को
अपने
अंदाज़
से
गँवाने
का
Jaun Elia
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ज़ख़्म
जो
तुम
ने
दिया
वो
इस
लिए
रक्खा
हरा
ज़िंदगी
में
क्या
बचेगा
ज़ख़्म
भर
जाने
के
बाद
Azm Shakri
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ज़िंदगी
भर
के
लिए
दिल
पे
निशानी
पड़
जाए
बात
ऐसी
न
लिखो,
लिख
के
मिटानी
पड़
जाए
Aadil Rasheed
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ज़िंदगी
यूँँही
बहुत
कम
है
मोहब्बत
के
लिए
रूठ
कर
वक़्त
गँवाने
की
ज़रूरत
क्या
है
Unknown
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ये
ज़मीं
किस
क़दर
सजाई
गई
ज़िंदगी
की
तड़प
बढ़ाई
गई
आईने
से
बिगड़
के
बैठ
गए
जिन
की
सूरत
जिन्हें
दिखाई
गई
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Sahir Ludhianvi
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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भेज
रहे
हो
मुझ
को
ख़ुदस
दूर
मगर
ये
तो
सुन
लो
पाँव
नहीं
दुखते
हैं
जानाँ
दिल
दुखते
हैं
हिजरत
में
Ashutosh Kumar "Baagi"
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ख़िज़्र
की
उम्र
भी
अता
कर
दी
फिर
तेरा
हिज्र
भी
दिया
साहब
Ashutosh Kumar "Baagi"
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वो
शीरीनी
मुझे
महसूस
होगी
वो
जब
भी
ग़ैर
को
चूमा
करेगी
Ashutosh Kumar "Baagi"
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बस
यही
बात
मुझको
खलती
है
क्यूँँ
भला
साँस
मेरी
चलती
है
एक
रस्ता
है
ख़ुद-कुशी
अब
तो
अब
ये
वहशत
नहीं
सँभलती
है
हाए
ये
चाँद
क्यूँँ
नहीं
मरता
हाए
ये
धूप
क्यूँँ
निकलती
है
इश्क़
आता
नहीं
कभी
तन्हा
इक
उदासी
भी
साथ
चलती
है
मेरी
बाहों
में
जो
बहलती
थी
किसकी
बाहों
में
अब
मचलती
है
पाँव
में
बाँध
कर
नई
पायल
ख़ामुशी
छत
पे
क्यूँँ
टहलती
है
जुगनुओं
तुम
ही
मुझको
बतलाओ
रात
कपड़े
कहाँ
बदलती
है
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Ashutosh Kumar "Baagi"
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उसे
अपना
बनाना
चाहता
था
यही
सारा
ज़माना
चाहता
था
अब
इक
तस्वीर
बनकर
रह
गया
हूँ
हमेशा
मुस्कुराना
चाहता
था
बस
इक
ज़रिया
थी
मेरी
ख़ुद-कुशी
जाँ
मैं
उसका
दिल
दुखाना
चाहता
था
क़ज़ा
से
डर
नहीं
लगता
है
लेकिन
ज़रा
बस
शायराना
चाहता
था
जो
लड़का
रह
गया
मुनकिर
ही
होकर
ख़ुदा
तुमको
बनाना
चाहता
था
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Ashutosh Kumar "Baagi"
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