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Azhan 'Aajiz'
tum bichhad rahe ho ab dost is safar men kyun
tum bichhad rahe ho ab dost is safar men kyun | तुम बिछड़ रहे हो अब दोस्त इस सफ़र में क्यूँँ
- Azhan 'Aajiz'
तुम
बिछड़
रहे
हो
अब
दोस्त
इस
सफ़र
में
क्यूँँ
बात
मत
बनाओ
अब,
सब
समझ
रहा
हूँ
मैं
- Azhan 'Aajiz'
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जैसे
मेरी
निगाह
ने
देखा
न
हो
कभी
महसूस
ये
हुआ
तुझे
हर
बार
देख
कर
Shad Azimabadi
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अपनी
हालत
का
ख़ुद
एहसास
नहीं
है
मुझ
को
मैं
ने
औरों
से
सुना
है
कि
परेशान
हूँ
मैं
Aasi Uldani
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हैं
लहू
से
कई
गुना
बढ़कर
वो
जो
एहसास
के
मरासिम
हैं
Shadan Ahsan Marehrvi
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देख
कर
हर
कोई
बेकार
समझ
ले
मुझ
को
अपनी
उल्फ़त
में
गिरफ़्तार
समझ
ले
मुझ
को
बिना
उसके
तिरी
जन्नत
मुझे
मंज़ूर
नहीं
तू
मिरी
मान
गुनहगार
समझ
ले
मुझ
को
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Faiz Ahmad
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महसूस
कर
रहा
था
उसे
अपने
आस
पास
अपना
ख़याल
ख़ुद
ही
बदलना
पड़ा
मुझे
Ameer Qazalbash
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रोज़
मिलने
पे
भी
लगता
था
कि
जुग
बीत
गए
इश्क़
में
वक़्त
का
एहसास
नहीं
रहता
है
Ahmad Mushtaq
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ख़ुद
को
इतना
जो
हवा-दार
समझ
रक्खा
है
क्या
हमें
रेत
की
दीवार
समझ
रक्खा
है
Haseeb Soz
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लोग
औरत
को
फ़क़त
जिस्म
समझ
लेते
हैं
रुह
भी
होती
है
उस
में
ये
कहाँ
सोचते
हैं
Sahir Ludhianvi
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ये
नहीं
है
कि
वो
एहसान
बहुत
करता
है
अपने
एहसान
का
एलान
बहुत
करता
है
आप
इस
बात
को
सच
ही
न
समझ
लीजिएगा
वो
मेरी
जान
मेरी
जान
बहुत
करता
है
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Jawwad Sheikh
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मज़ा
चखा
के
ही
माना
हूँ
मैं
भी
दुनिया
को
समझ
रही
थी
कि
ऐसे
ही
छोड़
दूँगा
उसे
Rahat Indori
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दिल
में
तुझे
रखूँ
तो
अब
मैं
कहाँ
रहूँ
फिर
तलवार
दो
मुझे
रखनी,
इक
मियान
में
अब
कोई
ज़रा
बने
साथी
यार
अब
मिरा
भी
लगता
नहीं
मिरा
ये
दिल,
इस
जहान
में
अब
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न
की
उम्मीद
मैंने
इस
लिए
भी
कि
उम्मीदें
सितम
ढाती
हैं
मुझ
पे
नहीं
अब
ख़ाब
कोई
देखता
हूँ
कि
ताबीरें
सितम
ढाती
हैं
मुझ
पे
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सदा
करता
रहा
है
बस
सफ़र
कोई
रहा
है
दूर
सब
सेे
उम्र
भर
कोई
उदासी
और
तन्हाई
रही
मुझ
में
मुझे
खाता
रहा
अंदर
से
डर
कोई
मिले
कोई
मुझे
मेरी
तरह
का
शख़्स
ख़ुदा
ने
जो
उतारा
हो
अगर
कोई
पड़े
हैं
जान
के
लाले
तबाही
है
सरल
है
क्या
मुहब्बत
की
डगर
कोई
मिरा
भी
हाल
पूछे
देखले
मुझको
करे
मुझ
पर
करम
की
इक
नज़र
कोई
करूँँ
ताज़ीम
क़दमों
की
सदा
उसके
गली
से
जो
करे
तेरी
गुज़र
कोई
कि
मुझ
पर
ज़ुल्म
ढाए
मैं
फ़िलिस्तीं
हूँ
न
छोड़ी
ज़ुल्म
ढाने
में
कसर
कोई
बदलते
मंज़रों
से
इल्म
होता
है
कि
होगा
हादसा
पेश-ए-नज़र
कोई
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रहे
हैं
उम्र
भर
हम
यार
तन्हा
कि
हो
जाते
हैं
हम
हर
बार
तन्हा
मिले
हैं
झूटों
को
तो
झूटे
यारो
हमेशा
से
रहे
ख़ुद्दार
तन्हा
हम
ऐसे
दोस्त
तन्हा
हैं
कि
जैसे
किसी
जंगल
में
हों
ख़ूँख़ार
तन्हा
उतारा
यूँँ
भी
ये
आदम
ख़ुदा
ने
बिना
आदम
के
था
संसार
तन्हा
हमारा
साथी
कोई
था
नहीं
तो
गुज़ारा
हमने
फिर
इतवार
तन्हा
किसी
को
मिल
गई
हैं
चाहतें
सब
तो
कोई
रह
गया
दिल-दार
तन्हा
पुकारा
इस
तरह
उसने
कि
'आरिज़'
उठे
पाज़ेब
की
झंकार
तन्हा
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नहीं
रहता
है
हम
सेे
बे-ख़बर
वो
सभी
पे
रखता
है
अपनी
नज़र
वो
किसी
भी
तौर
कर
लूंगा
गुज़र
मैं
मुझे
बस
ख़्याल
आया
इक
मगर
वो
न
जाने
कब
मिले
घर
देखनें
को
कि
ढलती
शाम
वो
होती
सहर
वो
करी
हिजरत
यहाँ
मैंने
सुनो
पर
बड़ा
ही
याद
आता
है
नगर
वो
मिला
अच्छा
मुझे
सब
कुछ
जहाँ
में
जो
चाहा
था
मिला
होता
अगर
वो
यहाँ
पे
सुन
सभी
की
दोस्त
लेकिन
तिरा
दिल
जो
कहे
बस
यार
कर
वो
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