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Azhan 'Aajiz'
gham ha
gham ha | ग़म हमें आपका नहीं मिलता
- Azhan 'Aajiz'
ग़म
हमें
आपका
नहीं
मिलता
ये
हमें
मर्तबा
नहीं
मिलता
कोई
भी
रास्ता
नहीं
मिलता
अब
यहाँ
रहनुमा
नहीं
मिलता
आप
ही
इक
हमें
न
मिल
पाए
वर्ना
दुनिया
में
क्या
नहीं
मिलता
मिल
गए
शख़्स
तो
बहुत
गोया
आपसा
दूसरा
नहीं
मिलता
आशिक़ों
को
फ़क़त
सनम
न
मिले
दहर-ए-फ़ानी
में
क्या
नहीं
मिलता
अब
यहाँ
चाँदनी
नहीं
मिलती
तो
यहाँ
चाँदना
नहीं
मिलता
घर
में
छोटे
बड़े
बने
जब
से
घर
में
कोई
बड़ा
नहीं
मिलता
मिल
गई
हैं
रफ़ाक़तें
सब
की
क़ुर्ब
बस
आपका
नहीं
मिलता
सब
मिला
है
जहान
में
लेकिन
सिर्फ़
अहल-ए-वफ़ा
नहीं
मिलता
जो
तिरे
इस्म
से
पिलाए
मय
वो
हमें
मय-कदा
नहीं
मिलता
शख़्स
आरिज़
अज़ीज़
मिलते
हैं
पर
यहाँ
आइना
नहीं
मिलता
- Azhan 'Aajiz'
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अब
मुझे
आराम
करना
है
मिले
मंज़िल
मिरी
भी
अब
थकन
होने
लगी
सच
में
सफ़र
की
इस
थकन
से
बाग़बाँ
होते
हुए
तेरे
यहाँ
कैसा
सितम
है
रोज़
कोई
तोड़
लेता
है
गुलो-नर्गिस
चमन
से
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मैं
यहाँ
कुछ
शोर
करना
चाहता
हूँ
ख़ामुशी
से
अब
उभरना
चाहता
हूँ
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देख
उड़ते
मैं
परिन्दे
आसमाँ
में
सोचता
हूँ
यार
क्या
अपने
गुमाँ
में
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तुम्हारे
शहरस
मेरी
जुड़ी
है
याद
यारों
हो
जाऊँ
मैं
तुम्हारे
शहर
में
आबाद
यारों
मुझे
अच्छा
नहीं
लगता
है
इसके
बाद
कोई
मुझे
इतना
पसंद
आया
है
शाहाबाद
यारों
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सितम
हो
रहे
हैं
बहुत
पर
मुसलमान
चुप
हैं
मुसलमान
तो
क्या
सभी
यार
इंसान
चुप
हैं
मिटा
ही
रही
है
सियासत
मुहब्बत
वतन
से
मगर
देखिए
इश्क़
के
सब
निगहबान
चुप
हैं
यहाँ
ख़त्म
सब
हो
चुकी
रौनकें
और
देखो
गुलों
को
नज़र
है
लगी
तो
गुलिस्तान
चुप
हैं
कि
आवाज़
अब
क्यूँँ
उठाते
नहीं
यार
हक़
की
भला
किस
लिए
अब
यहाँ
सब
मुसलमान
चुप
हैं
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