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Avinash bharti
muhabbat men ghamo se paar jaane ka
muhabbat men ghamo se paar jaane ka | मुहब्बत में ग़मो से पार जाने का
- Avinash bharti
मुहब्बत
में
ग़मो
से
पार
जाने
का
किया
है
फ़ैसला
अब
हार
जाने
का
भरा
लगता
था
आने
से
तेरे
जो
घर
है
अब
मातम-कदा
त्यौहार
जाने
का
कहानी
चल
रही
है
और
ख़ुश
हैं
सब
किसे
दुख
छूट
इक
क़िरदार
जाने
का
सफ़र
में
मुश्किलें
तो
हैं
मगर
मैंने
इरादा
कर
लिया
इस
बार
जाने
का
वो
मज़हब
की
लड़ाई
ख़त्म
तो
कर
दे
मगर
डर
है
उसे
सरकार
जाने
का
- Avinash bharti
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उसे
पागल
बनाती
फिर
रही
हो
जिसे
शौहर
बनाना
चाहिए
था
Arvind Inaayat
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उन्हीं
रास्तों
ने
जिन
पर
कभी
तुम
थे
साथ
मेरे
मुझे
रोक
रोक
पूछा
तिरा
हम-सफ़र
कहाँ
है
Bashir Badr
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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सफ़र
हालाँकि
तेरे
साथ
अच्छा
चल
रहा
है
बराबर
से
मगर
एक
और
रास्ता
चल
रहा
है
Shariq Kaifi
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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मैं
सोचता
हूँ
जब
कभी
आओगी
सामने
किस
मुँह
से
कह
सकूँगा
मोहब्बत
नहीं
रही
Shoonya
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वो
राही
हूँ
पलभर
के
लिए,
जो
ज़ुल्फ़
के
साए
में
ठहरा,
अब
ले
के
चल
दूर
कहीं,
ऐ
इश्क़
मेरे
बेदाग
मुझे
।
Raja Mehdi Ali Khan
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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आ
गई
है
हमें
अदाकारी
आँख
में
अब
नमी
नहीं
लगती
Avinash bharti
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इश्क़
सारा
ज़िंदगी
पे
वार
कर
जीत
हमने
ली
है
बाज़ी
हारकर
है
ज़रूरत
तुझको
भी
तो
साथ
की
हर
किसी
को
यूँँ
न
तू
इंकार
कर
रस्ते
में
आती
रहेंगी
मुश्किलें
मंज़िलों
की
सोच
इनको
पार
कर
नफ़रतें
फ़ैली
हैं
चाहे
हर
तरफ़
मशवरा
मेरा
यही
है
प्यार
कर
धीरे
धीरे
सब
सही
हो
जाएगा
बस
भरोसा
ख़ुद
पे
तू
हर
बार
कर
जीते
जी
मिलना
नहीं
मुमकिन
है
तो
ख़ुद
को
इक
दिन
आउँगा
मैं
मारकर
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Avinash bharti
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साथ
उनके
होने
का
दिल
करता
है
शाम
ढलते
रोने
का
दिल
करता
है
धरती
बंजर
दिल
की
अब
तो
है
मगर
ख़्वाब
इन
पर
बोने
का
दिल
करता
है
रात
जिस
में
हो
तेरी
मौजूदगी
इक
दफ़ा
बस
सोने
का
दिल
करता
है
ग़ैर
हूँ
पर
भार
तेरी
फ़िक़्र
का
अब
भी
मुझको
ढोने
का
दिल
करता
है
शहर
के
सब
रस्ते
मुझको
याद
हैं
फिर
भी
इन
में
खोने
का
दिल
करता
है
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Avinash bharti
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किसे
मालूम
कितने
ग़म
छिपाता
है
वो
चेहरा
जो
हमेशा
मुस्कुराता
है
मैं
भी
कुछ
सोचकर
रखता
हूँ
नज़दीकी
वो
भी
कुछ
सोचकर
के
दूर
जाता
है
ख़ुशी
की
बात
सुनकर
के
हुआ
है
दुख
बिछड़
कर
भी
वो
सब
वादे
निभाता
है
पसीना
ख़ूँ
लगाकर
भी
पराया
ही
कोई
मज़दूर
कितने
घर
बनाता
है
लगाता
आग
ख़ुद
है
वो
सियासत
में
सियासत
में
ही
फिर
उसको
बुझाता
है
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Avinash bharti
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हुक्मरान
इस
बात
से
नाशाद
है
हर
किसी
की
क्यूँ
ज़बाँ
आज़ाद
है
Avinash bharti
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