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Ashraf Ali
saare raushan deep ashraf bujh ga.e
saare raushan deep ashraf bujh ga.e | सारे रौशन दीप "अशरफ़" बुझ गए
- Ashraf Ali
सारे
रौशन
दीप
"अशरफ़"
बुझ
गए
यूँँ
हवा
थी
बे-रहम,
सब
कुछ
ख़तम
- Ashraf Ali
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फ़ातिहा
पढ़
कि
फूल
रख
मुझ
पर
आ
गया
है
तो
कुछ
जता
अफ़सोस
Siraj Faisal Khan
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ये
जो
है
फूल
हथेली
पे
इसे
फूल
न
जान
मेरा
दिल
जिस्म
से
बाहर
भी
तो
हो
सकता
है
Abbas Tabish
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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फूल
के
होंठों
से
ख़ुश्बू
के
मआनी
सुनकर
अपना
शे'र
अच्छा
लगा
तेरी
ज़ुबानी
सुनकर
Rajesh Reddy
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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चल
दिए
घर
से
तो
घर
नहीं
देखा
करते
जाने
वाले
कभी
मुड़
कर
नहीं
देखा
करते
सीपियां
कौन
किनारे
से
उठा
कर
भागा
ऐसी
बाते
समुंदर
नहीं
देखा
करते
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Unknown
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यक़ीन
हो
तो
कोई
रास्ता
निकलता
है
हवा
की
ओट
भी
ले
कर
चराग़
जलता
है
Manzoor Hashmi
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अगरचे
इश्क़
में
मजनू
बड़े
बदनाम
होते
हैं
अगरचे
क़ैस
जैसे
आशिक़ों
के
नाम
होते
हैं
भटक
सकती
नहीं
जंगल
में
लैला
चाह
करके
भी
अजी
लैला
को
घर
में
दूसरे
भी
काम
होते
हैं
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Gagan Bajad 'Aafat'
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मैं
अपनी
हिजरत
का
हाल
लगभग
बता
चुका
था
सभी
को
और
बस
तिरे
मोहल्ले
के
सारे
लड़के
हवा
बनाने
में
लग
गए
थे
Vikram Gaur Vairagi
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हम
इक
ही
लौ
में
जलाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
नई
हवा
से
बचाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
दरअस्ल
उसको
फ़क़त
चाय
ख़त्म
करनी
थी
हम
उसके
कप
को
सुनाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
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Zubair Ali Tabish
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हैं
दफ़्न
दिल
में
जो
राज़
सारे
मिलो
तो
तुम
पर
अयाँ
करूँँगा
तमाम
चाहत
तमाम
उल्फ़त
तमाम
हसरत
बयाँ
करूँँगा
है
एक
जंगल
हमारे
भीतर
जो
इक
सदी
से
सुलग
रहा
है
ख़ुशी
का
छलका
कभी
जो
आँसू
बुझा
के
इसको
धुआँ
करूँँगा
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Ashraf Ali
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फिलहाल
मेरे
ग़म
की
दवा
कुछ
भी
नहीं
है
सब
ठीक
नहीं
और
हुआ
कुछ
भी
नहीं
है
तुम
भी
वही
हम
भी
वही
हालात
वही
हैं
हर
बात
पुरानी
है
नया
कुछ
भी
नहीं
है
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Ashraf Ali
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मुआमला
था
महज़
मुक़द्दर
का
मेरा
महबूब
निकला
पत्थर
का
Ashraf Ali
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उदासी
से
निकालो
पीर
खींचो
कलेजा
फट
रहा
है
तीर
खींचो
ग़लत
पटरी
पे
गाड़ी
चल
रही
है
ख़ुदा
के
वास्ते
ज़ंजीर
खींचो
मुक़ाबिल
में
कोई
ज़ालिम
खड़ा
है
मयानों
से
मियाँ
शमशीर
खींचो
भरोसा
द्रौपदी
को
कृष्ण
पर
था
दुशासन
कह
रहा
था
चीर
खींचो
अजूबे
से
ज़रा
भी
कम
नहीं
हूँ
मुझे
देखो
मिरी
तस्वीर
खींचो
हैं
मुझ
में
अनगिनत
अल्फ़ाज़
'अशरफ़'
मुझे
लिक्खो
मिरी
तहरीर
खींचो
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Ashraf Ali
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जितने
मर्ज़ी
खेल
खेलो
ख़ूब
साज़िश
भी
रचो
वक़्त
आने
दो
कहूँगा,
उंगलियाँ
अंदर
रखो
Ashraf Ali
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