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Ashraf Ali
ab koi mujhse ghazal hogii nahin
ab koi mujhse ghazal hogii nahin | अब कोई मुझ सेे ग़ज़ल होगी नहीं
- Ashraf Ali
अब
कोई
मुझ
सेे
ग़ज़ल
होगी
नहीं
जौक़,
दानाई,
क़लम,
सब
कुछ
ख़तम
- Ashraf Ali
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भरे
हुए
जाम
पर
सुराही
का
सर
झुका
तो
बुरा
लगेगा
जिसे
तेरी
आरज़ू
नहीं
तू
उसे
मिला
तो
बुरा
लगेगा
ये
आख़िरी
कंपकंपाता
जुमला
कि
इस
तअ'ल्लुक़
को
ख़त्म
कर
दो
बड़े
जतन
से
कहा
है
उस
ने
नहीं
किया
तो
बुरा
लगेगा
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Zubair Ali Tabish
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जिस
दिन
तुम्हारे
ख़त
का
मुझे
इंतिज़ार
था
उस
दिन
तमाम
पंछी
कबूतर
लगे
मुझे
Ali Rumi
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चलो
माना
कि
रोना
मसअले
का
हल
नहीं
लेकिन
करे
भी
क्या
कोई
जब
ख़त्म
हर
उम्मीद
हो
जाए
Bhaskar Shukla
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सुलग
रहे
थे
शजर
दिल
तमाम
भँवरों
के
दिल
अपना
वार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
बहुत
मलाल
हुआ
देखकर
गुलिस्ताँ
में
तमाचा
मार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
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Shajar Abbas
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इश्क़
तिरी
इंतिहा
इश्क़
मिरी
इंतिहा
तू
भी
अभी
ना-तमाम
मैं
भी
अभी
ना-तमाम
Allama Iqbal
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हुस्न
बला
का
क़ातिल
हो
पर
आख़िर
को
बेचारा
है
इश्क़
तो
वो
क़ातिल
जिसने
अपनों
को
भी
मारा
है
ये
धोखे
देता
आया
है
दिल
को
भी
दुनिया
को
भी
इसके
छल
ने
खार
किया
है
सहरा
में
लैला
को
भी
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Jaun Elia
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या'नी
कि
इश्क़
अपना
मुकम्मल
नहीं
हुआ
गर
मैं
तुम्हारे
हिज्र
में
पागल
नहीं
हुआ
वो
शख़्स
सालों
बाद
भी
कितना
हसीन
है
वो
रंग
कैनवस
पे
कभी
डल
नहीं
हुआ
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Kushal Dauneria
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इसी
लिए
तो
यहाँ
अब
भी
अजनबी
हूँ
मैं
तमाम
लोग
फ़रिश्ते
हैं
आदमी
हूँ
मैं
Bashir Badr
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तमाम
होश
ज़ब्त
इल्म
मस्लहत
के
बाद
भी
फिर
इक
ख़ता
मैं
कर
गया
था
माज़रत
के
बाद
भी
Pallav Mishra
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चाँद
सा
मिस्रा
अकेला
है
मिरे
काग़ज़
पर
छत
पे
आ
जाओ
मिरा
शे'र
मुकम्मल
कर
दो
Bashir Badr
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है
नाज़
मुझको
आप
मेरे
राब्ते
में
हैं
मेरे
भी
हिस्से
आ
गए
कुछ
शानदार
लोग
ज़िंदादिली
का
ज़िक्र
कहीं
हो
रहा
हो
तो
सुनते
ही
याद
आते
हैं
बचपन
के
यार
लोग
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Ashraf Ali
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तुम
बिन
शायद
जी
न
पाऊँ
ऐसा
पहले
लगता
था
लेकिन
अब
भी
ज़िंदा
हूँ,
यानी
भ्रम
था,
टूट
गया
Ashraf Ali
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सब
महँगे
ज़ेवरात
की
क़ीमत
घटाऊँगा
सोने
का
नाम
आज
से
पीतल
करूँँगा
मैं
Ashraf Ali
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सारे
रौशन
दीप
"अशरफ़"
बुझ
गए
यूँँ
हवा
थी
बे-रहम,
सब
कुछ
ख़तम
Ashraf Ali
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जो
भी
मुझ
में
बाक़ी
है
गड़बड़ी
निकालूँगा
चाबियाँ
बनाऊँगा,
हथकड़ी
निकालूँगा
ये
जो
तुम
शरीफ़ों
को
धौंस
देते
फिरते
हो
एक
दिन
तुम्हारी
भी
हेकड़ी
निकालूँगा
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Ashraf Ali
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