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Arohi Tripathi
khudkushi karne lagii hooñ
khudkushi karne lagii hooñ | ख़ुद-कुशी करने लगी हूँ
- Arohi Tripathi
ख़ुद-कुशी
करने
लगी
हूँ
शा'इरी
करने
लगी
हूँ
कर
दिया
बर्बाद
ख़ुद
को
ज़िंदगी
करने
लगी
हूँ
बुतपरस्ती
काम
मेरा
काफ़िरी
करने
लगी
हूँ
- Arohi Tripathi
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हमारा
इश्क़
इबादत
का
अगला
दर्जा
है
ख़ुदा
ने
छोड़
दिया
तो
तुम्हारा
नाम
लिया
ग़मों
से
बैर
था
सो
हमने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
शजर
ने
गिर
के
परिंदों
से
इन्तेक़ाम
लिया
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Balmohan Pandey
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मुद्दत
के
बाद
उस
ने
जो
की
लुत्फ़
की
निगाह
जी
ख़ुश
तो
हो
गया
मगर
आँसू
निकल
पड़े
Kaifi Azmi
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ज़िंदगी
इक
फ़िल्म
है
मिलना
बिछड़ना
सीन
हैं
आँख
के
आँसू
तिरे
किरदार
की
तौहीन
हैं
Sandeep Thakur
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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इश्क़
में
ख़ुद-कुशी
नहीं
करते
इश्क़
में
इंतिज़ार
करते
हैं
Rajesh Reddy
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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और
कुछ
तोहफ़ा
न
था
जो
लाते
हम
तेरे
नियाज़
एक
दो
आँसू
थे
आँखों
में
सो
भर
लाएँ
हैं
हम
Meer Hasan
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रास्ता
जब
इश्क़
का
मौजूद
है
फिर
किसी
की
क्यूँँ
इबादत
कीजिए?
ख़ुद-कुशी
करना
बहुत
आसान
है
कुछ
बड़ा
करने
की
हिम्मत
कीजिए
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Bhaskar Shukla
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अब
दुआएँ
पा
रहा
है
हर
दिल-ए-नाशाद
की
क्या
ग़ज़ब
होगा
वो
जिसने
ख़ुद-कुशी
ईजाद
की
शा'इरी
का
ये
हुनर
कुछ
देर
से
आया
मगर
जी-हुज़ूरी
की
नहीं
मैंने
किसी
उस्ताद
की
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Rituraj kumar
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मोहब्बत
में
इक
ऐसा
वक़्त
भी
दिल
पर
गुज़रता
है
कि
आँसू
ख़ुश्क
हो
जाते
हैं
तुग़्यानी
नहीं
जाती
Jigar Moradabadi
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जी
रही
हूँ
आपके
बिन
ज़िन्दगी
से
सोचना
लिख
रही
हूँ
आपको
ये
शा'इरी
से
सोचना
Arohi Tripathi
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ग़म
का
मारा
कोई
नहीं
होता
बे-सहारा
कोई
नहीं
होता
Arohi Tripathi
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फ़साने
से
हक़ीक़त
बन
गए
हैं
हमारी
वो
मोहब्बत
बन
गए
हैं
मिरी
तो
साँस
चलती
हैं
उन्हीं
से
हमारी
वो
ज़रूरत
बन
गए
हैं
बड़ी
बेकार
आदत
लग
गई
है
मगर
वो
ख़ास
आदत
बन
गए
हैं
मुझे
चाहत
नहीं
ज़र्रा
बराबर
मिरे
दिल
की
हुकूमत
बन
गए
हैं
नमाज़ी
बन
गए
हैं
बाद
काफ़िर
हमारी
जब
इबादत
बन
गए
हैं
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Arohi Tripathi
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वो
हक़ीक़त
भी
ख़्वाब
कहता
है
लफ़्ज़-ए-अव्वल
किताब
कहता
है
जब
से
हरकत
सुनी
है
साँसों
की
तब
से
हरदम
शबाब
कहता
है
बात
होगी
अगर
अदाओं
की
हुस्न
गोया
अज़ाब
कहता
है
होंठ
पर
होंठ
उसने
रक्खा
फिर
लब
को
तब
से
गुलाब
कहता
है
मेरी
हर
बात
अच्छी
लगती
है
इस
जहाँ
को
ख़राब
कहता
है
जब
कभी
वो
क़रीब
आता
है
जाँ
हटाओ
नक़ाब
कहता
है
जब
से
हासिल
किया
मोहब्बत
को
खु़द
को
इश्क़-ए-निसाब
कहता
है
शे'र
अच्छा
बुरा
पढूँ
जो
भी
वो
फ़क़त
लाजवाब
कहता
है
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Arohi Tripathi
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साफ़
इनकार
कर
नहीं
पाई
उन
सेे
मैं
प्यार
कर
नहीं
पाई
मैंने
कोशिश
हज़ार
की
लेकिन
फिर
भी
दीदार
कर
नहीं
पाई
आज़
सोची
थी
बात
कह
दूँगी
ख़ैर
इक़रार
कर
नहीं
पाई
अपने
दिल
में
जगह
बनाई
पर
उन
सेे
इज़हार
कर
नहीं
पाई
वो
मिला
पूछने
लगा
मुझ
सेे
इश्क़
बेज़ार
कर
नहीं
पाई
जो
मिरा
इश्क़
था
मुहब्बत
था
उसको
सरदार
कर
नहीं
पाई
लड़खड़ाती
रही
ग़ज़ल
जानी
शे'र
तहदार
कर
नहीं
पाई
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Arohi Tripathi
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