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Prashant Arahat
log kahte hain abhii tak aap hi mahboob ho
log kahte hain abhii tak aap hi mahboob ho | लोग कहते हैं अभी तक आप ही महबूब हो
- Prashant Arahat
लोग
कहते
हैं
अभी
तक
आप
ही
महबूब
हो
अब
उन्हें
ये
जानकारी
है
नहीं
क्या
कीजिए
- Prashant Arahat
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उतारा
दिल
के
वरक़
पर
तो
कितना
पछताया
वो
इंतिसाब
जो
पहले
बस
इक
किताब
पे
था
Aanis Moin
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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अगर
पलक
पे
है
मोती
तो
ये
नहीं
काफ़ी
हुनर
भी
चाहिए
अल्फ़ाज़
में
पिरोने
का
Javed Akhtar
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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बे-गिनती
बोसे
लेंगे
रुख़-ए-दिल-पसंद
के
आशिक़
तिरे
पढ़े
नहीं
इल्म-ए-हिसाब
को
Haidar Ali Aatish
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एक
आवाज़
पे
आ
जाती
है
दौड़ी
दौड़ी
दश्त-ओ-सहरा-ओ-बयाबान
नहीं
देखती
है
दोस्ती
दोस्ती
होती
है
तुम्हें
इल्म
नहीं
दोस्ती
फ़ाइदा
नुक़सान
नहीं
देखती
है
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Aadil Rasheed
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किताब-ए-इश्क़
में
हर
आह
एक
आयत
है
पर
आँसुओं
को
हुरूफ़-ए-मुक़त्तिआ'त
समझ
Umair Najmi
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किस
तरह
जमा
कीजिए
अब
अपने
आप
को
काग़ज़
बिखर
रहे
हैं
पुरानी
किताब
के
Adil Mansuri
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ये
तो
बढ़ती
ही
चली
जाती
है
मीआद-ए-सितम
ज़ुज़
हरीफ़ान-ए-सितम
किस
को
पुकारा
जाए
वक़्त
ने
एक
ही
नुक्ता
तो
किया
है
तालीम
हाकिम-ए-वक़त
को
मसनद
से
उतारा
जाए
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Jaun Elia
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धूप
इतनी
है
कि
छाया
भी
ठिकाना
चाहती
है
आज
कल
वो
साथ
मेरा
छोड़
जाना
चाहती
है
चाहती
है
साथ
देना
हर
घड़ी
में
हर
समय
पर
चिलचिलाती
धूप
में
दामन
बचाना
चाहती
है
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Prashant Arahat
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मुझे
फिर
से
मुहब्बत
हो
गई
है
ये
कैसी
आज
वहशत
हो
गई
है
मैं
अपने
सूर्य
को
ढलने
न
दूँगा
अँधेरों
से
बग़ावत
हो
गई
है
मुहब्बत
में
तो
धोखा
खा
चुके
हैं
मगर
फूलों
से
चाहत
हो
गई
है
उसी
का
रूप
दिखता
शा'इरी
में
मियाँ
ये
तो
मुसीबत
हो
गई
है
पिता
की
आँख
में
आँसू
बचे
हैं
कि
बेटी
आज
रुख़्सत
हो
गई
है
तुम्हारे
होंठ
जब
होंठों
पे
आए
मुझे
सिगरेट
से
फुर्सत
हो
गई
है
तुम्हारे
शहर
में
तो
शा'इरी
से
हमारी
यार
शोहरत
हो
गई
है
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Prashant Arahat
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ज़मीं
से
आसमाँ
तक
नूर
तेरा
ही
नज़र
आया
तुझे
जब
चाँद
ने
देखा
ज़मीं
पर
वो
उतर
आया
खिले
हैं
फूल
के
जैसे
दर-ओ-दीवार
सब
घर
के
ख़ुशी
है
रौनक़ें
हैं
आज
मेरा
यार
घर
आया
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Prashant Arahat
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चलो
अब
चाय
पीते
हैं
कहीं
पर
तुम्हारे
शहर
में
सर्दी
बहुत
है
Prashant Arahat
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उगाई
फ़स्ल
मैंने
थी
बड़ी
मेहनत
लगाकर
के
मगर
बेवक़्त
बारिश
ने
तबाही
सी
मचाई
है
Prashant Arahat
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