zamaane men nahin kuchh bas tumhaara saath kaafi hai | ज़माने में नहीं कुछ बस तुम्हारा साथ काफ़ी है

  - Prashant Arahat
ज़मानेमेंनहींकुछबसतुम्हारासाथकाफ़ीहै
बितानेकोअवधकीशाम,येसौग़ातकाफ़ीहै
इरादाहैअभीमेराक्षितिजतकसाथचलनेका
रहेहाथोंमेंमेरेबसतुम्हाराहाथकाफ़ीहै
सुनादोजोसुनानीहोगुनाहोंकीसज़ामेरे
अदालतहोतुम्हींतोअबतुम्हारीबातकाफ़ीहै
हमेशायादआएगीमुझेहरपलतुम्हारेबिन
गुज़ारीथीगुज़िश्तासालजो,वोरातकाफ़ीहै
ज़रूरतहीनहींअनुबंधपत्रोंकीमुझेतोअब
कहीजोबातहैमैंनेमियाँवोबातकाफ़ीहै
मुहब्बतमेंअलगकरनेपेआमादाज़मानाहै
नहींकुछऔरबसइनकेलिएतोज़ातकाफ़ीहै
  - Prashant Arahat
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