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Alankrat Srivastava
tumhaari hi mohabbat ne sikhaaya ye hunar varna
tumhaari hi mohabbat ne sikhaaya ye hunar varna | तुम्हारी ही मोहब्बत ने सिखाया ये हुनर वरना
- Alankrat Srivastava
तुम्हारी
ही
मोहब्बत
ने
सिखाया
ये
हुनर
वरना
बहुत
जी
जान
से
पढ़
कर
फ़क़त
इंजीनियर
होते
- Alankrat Srivastava
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आदमिय्यत
और
शय
है
इल्म
है
कुछ
और
शय
कितना
तोते
को
पढ़ाया
पर
वो
हैवाँ
ही
रहा
Sheikh Ibrahim Zauq
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हुआ
जौन
को
पढ़
के
मालूम
ये
उदासी
का
भी
इक
कलर
होता
है
Viru Panwar
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ये
शबनमी
लहजा
है
आहिस्ता
ग़ज़ल
पढ़ना
तितली
की
कहानी
है
फूलों
की
ज़बानी
है
Bashir Badr
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इल्म
जब
होगा
किधर
जाना
है
हाए
तब
तक
तो
गुज़र
जाना
है
Madan Mohan Danish
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किस
तरह
जमा
कीजिए
अब
अपने
आप
को
काग़ज़
बिखर
रहे
हैं
पुरानी
किताब
के
Adil Mansuri
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चुपके
चुपके
वो
पढ़
रहा
है
मुझे
धीरे
धीरे
बदल
रहा
हूँ
मैं
Aziz Nabeel
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'आशिक़
का
ख़त
है
पढ़ना
ज़रा
देख-भाल
के
काग़ज़
पे
रख
दिया
है
कलेजा
निकाल
के
LALA RAKHA RAM BARQ
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हम
ऐसी
कुल
किताबें
क़ाबिल-ए-ज़ब्ती
समझते
हैं
कि
जिन
को
पढ़
के
लड़के
बाप
को
ख़ब्ती
समझते
हैं
Akbar Allahabadi
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बहुत
से
ग़म
समेट
कर
बनाई
एक
डायरी
चुवाव
देख
रात
भर
बनाई
एक
डायरी
ये
हर्फ़
हर्फ़
लफ़्ज़
लफ़्ज़
क़ब्र
है
वरक़
वरक़
दिल-ए-हज़ीं
से
इस
क़दर
बनाई
एक
डायरी
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Aves Sayyad
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लिक्खा
गया
न
कुछ
कभी
मुझ
सेे
जवाब
में
रक्खा
ही
रह
गया
है
तेरा
ख़त
किताब
में
Ankit Maurya
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हमारा
भी
है
थोड़ा
नाम
दिल्ली
में
सुनो
के
हम
भी
हैं
बदनाम
दिल्ली
में
किसी
भी
काम
के
ख़ातिर
भटकना
भी
है
इक
बेहद
ज़रूरी
काम
दिल्ली
मैं
सुब्ह
जाना
की
वो
दिल्ली
निवासी
है
बितानी
है
मुझे
अब
शाम
दिल्ली
में
सभी
को
छोड़
बस
इक
दिन
अचानक
से
हो
जाना
है
मुझे
गुमनाम
दिल्ली
में
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Alankrat Srivastava
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हफ़्त-क़ुल्ज़ुम
पे
ग़ज़ल
कहनी
है
तेरे
कुमकुम
पे
ग़ज़ल
कहनी
है
है
बहुत
चीज़ें
मगर
मुझको
तो
आदतन
तुम
पे
ग़ज़ल
कहनी
है
गीत
जो
तुम
को
लुभाते
हैं
जी
उस
तरन्नुम
पे
ग़ज़ल
कहनी
हैं
जिस
सहारे
मैं
ग़ज़ल
कहता
था
उस
तलातुम
पे
ग़ज़ल
कहनी
है
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Alankrat Srivastava
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कभी
हँसता
हुआ
देखा
था
ख़ुद
को
एक
शीशे
में
मगर
जीते-जी
ये
मौका
दुबारा
न
मिला
मुझको
Alankrat Srivastava
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बिना
तेरे
अधूरे
मेरे
हर
इक
शे'र
रह
जाते
कि
जैसे
राम
बिन
शबरी
के
सारे
बेर
रह
जाते
तुम्हारे
वास्ते
मैंने
यहाँ
महफ़िल
सजाई
थी
भला
होता
अगर
तुम
और
थोड़ी
देर
रह
जाते
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Alankrat Srivastava
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अगर
तुम
कहो
हम
बदल
जाते
हैं
जी
हैं
पत्थर
मगर
हम
पिघल
जाते
हैं
जी
अमीरी
बुलंदी
की
चाहत
न
थी
सो
ग़रीबी-फ़क़ीरी
में
पल
जाते
हैं
जी
सभी
गीत
उन
पर
ना
थे
पर
हुआ
यूँँ
सभी
गीत
में
वो
तो
ढल
जाते
हैं
जी
ख़ता
मेरी
इस
में
नहीं
थोड़ी
सी
भी
सभी
को
भले
लोग
खल
जाते
हैं
जी
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Alankrat Srivastava
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