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Aqib khan
sulagkar ke zaraa bujh ja raha hooñ
sulagkar ke zaraa bujh ja raha hooñ | सुलगकर के ज़रा बुझ जा रहा हूँ
- Aqib khan
सुलगकर
के
ज़रा
बुझ
जा
रहा
हूँ
तभी
तो
मैं
नहीं
रह
पा
रहा
हूँ
ये
किस
दर्जे
पे
ख़ुद
को
ला
दिया
है
कदम
धँसने
लगे
पछता
रहा
हूँ
- Aqib khan
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जैसे
ही
होती
है
बरसात
की
आवाजाही
तेज़
हो
जाती
है
जज़्बात
की
आवाजाही
पेड़
पौधों
को
ही
बस
दोष
न
देना
यारों
होती
है
मुझ
में
भी
इक
ज़ात
की
आवाजाही
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Aqib khan
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हम
ऐसों
को
छोड़
के
कितना
ख़ुश
है
वो
हम
ऐसे
ही
राह
का
रोड़ा
होते
हैं
Aqib khan
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वो
मुझे
याद
कर
रही
होगी
रात
तारों
को
ताकती
होगी
एक
लड़की
जो
तुमको
चाहेगी
देख
लेना
वो
सिरफिरी
होगी
पूछते
क्यूँ
हो
उसके
बारे
में
वो
हवा
थी
वो
बह
गई
होगी
सोच
में
अब
तलक
पड़ा
हूँ
मैं
क्या
मुझे
भी
वो
सोचती
होगी
जो
मेरी
उसके
साथ
गुज़रेगी
यार
क्या
ख़ूब
ज़िन्दगी
होगी
ख़त
रखा
था
जो
उसकी
कॉपी
में
उसने
वो
कॉपी
देख
ली
होगी
जाने
की
वजह
ही
बता
देता
कुछ
न
कुछ
बात
तो
हुई
होगी
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Aqib khan
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कम-अज़-कम
दिल
सही
से
तोड़
जाना
ज़रा
अच्छा
तो
हो
दुखड़ा
हमारा
Aqib khan
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फिर
न
जाना
हो
तो
आ
सकते
हो
सच
में
आना
हो
तो
आ
सकते
हो
तुम
मिरा
ग़म
तो
बाँटने
से
रहे
दिल
दुखाना
हो
तो
आ
सकते
हो
मेरा
मुझ
में
रहा
नहीं
कुछ
भी
कुछ
न
पाना
हो
तो
आ
सकते
हो
मैं
कोई
राज़
खोलता
ही
नहीं
कुछ
बताना
हो
तो
आ
सकते
हो
ऐसे
कैसे
तुम्हें
मैं
आने
दूँ?
कुछ
बहाना
हो
तो
आ
सकते
हो
इक
निशाँ
आपका
बचा
हुआ
है
वो
मिटाना
हो
तो
आ
सकते
हो
क्यूँ
दलीलें
रईसज़ादा
सुने
गिड़गिड़ाना
हो
तो
आ
सकते
हो
मैं
भी
अब
हो
गया
तुम्हारी
तरह
आज़माना
हो
तो
आ
सकते
हो
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Aqib khan
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