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Aqib khan
ek tasveer thii puraani sii
ek tasveer thii puraani sii | एक तस्वीर थी पुरानी सी
- Aqib khan
एक
तस्वीर
थी
पुरानी
सी
याद
क्या
क्या
दिला
गई
मुझको
- Aqib khan
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ज़िंदा
लोगों
से
राब्ता
ही
नहीं
मुर्दे
आ
आके
बात
करते
हैं
Aqib khan
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और
क्या
डूबते
की
मंज़िल
है
रात
ही
दिन
ढले
की
मंज़िल
है
ज़ीस्त
जिस
रास्ते
में
पड़ती
है
मौत
उस
रास्ते
की
मंज़िल
है
पहले
इंसान
और
फिर
मज़हब
ये
मेरे
फ़लसफ़े
की
मंज़िल
है
तुझको
बस
ख़ुद
के
ग़म
ही
दिखते
हैं
ये
तेरे
दायरे
की
मंजिल
है
आदमी
ख़ुद
को
भूल
जाता
है
इश्क़
उस
हादसे
की
मंज़िल
है
कैसे
भी
तुक
में
तुक
भिड़ा
डालो
क्या
यही
क़ाफ़िए
की
मंज़िल
है
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Aqib khan
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मुहब्बत
में
शर्तें
नहीं
चाहिए
चले
जाओ
तुमको
जिधर
जाना
है
Aqib khan
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बनी
बनाई
ही
ढा
रहा
था
ये
कैसी
दुनिया
बना
रहा
था
बड़ा
सितम
था
कि
दिल
मकाँ
पर
जो
आ
रहा
था
वो
जा
रहा
था
फ़रेब
ओ
धोकों
के
इस
जहाँ
में
निभाने
वाला
निभा
रहा
था
कोई
तो
ढूँढो
कहाँ
गया
वो
वही
जो
अपना
बता
रहा
था
किसी
के
दिल
से
गया
निकाला
किसी
के
रस्ते
में
आ
रहा
था
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Aqib khan
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चश्म
दिखते
ये
जो
विराने
हैं
उसकी
यादों
के
क़ैदखाने
हैं
फिर
भटकते
भटकते
हम
दोनों
एक
ही
रास्ते
पे
आने
हैं
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Aqib khan
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