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Aqib khan
dil-e-viraan men kuchh bhi nazar nahin aata
dil-e-viraan men kuchh bhi nazar nahin aata | दिल-ए-विरान में कुछ भी नज़र नहीं आता
- Aqib khan
दिल-ए-विरान
में
कुछ
भी
नज़र
नहीं
आता
तुम्हारे
बाद
यहाँ
सब
धुआँ
धुआँ
सा
है
वो
हर
सवाल
के
बदले
जवाब
चाहता
था
वो
लड़का
जो
कि
तेरी
सम्त
बे-ज़ुबाँ
सा
है
- Aqib khan
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जिस
तरफ़
तू
है
उधर
होंगी
सभी
की
नज़रें
ईद
के
चाँद
का
दीदार
बहाना
ही
सही
Amjad Islam Amjad
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कुछ
नज़र
आता
नहीं
उस
के
तसव्वुर
के
सिवा
हसरत-ए-दीदार
ने
आँखों
को
अंधा
कर
दिया
Haidar Ali Aatish
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सब
लोग
जिधर
वो
हैं
उधर
देख
रहे
हैं
हम
देखने
वालों
की
नज़र
देख
रहे
हैं
Dagh Dehlvi
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ठहर
जाती
हैं
क्यूँ
नज़रें
वहाँ
पर
जहाँ
बैठी
थी
तुम
जुल्फ़ें
सुखाकर
Umesh Maurya
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हुस्न
सब
को
ख़ुदा
नहीं
देता
हर
किसी
की
नज़र
नहीं
होती
Ibn E Insha
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हमें
दीदार
से
मरहूम
रखकर
है
नज़र
दिल
पर
पराया
माल
ताको
और
दौलत
अपनी
रहने
दो
Dagh Dehlvi
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न
कोई
बीन
बजाई
न
टोकरी
खोली
बस
एक
फोन
मिलाने
पे
साँप
बैठा
है
कोई
भी
लड़की
अकेली
नज़र
नहीं
आती
यहाँ
हर
एक
ख़जाने
पे
साँप
बैठा
है
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Muzdum Khan
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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पहले
डाली
तेरे
चेहरे
पे
बहुत
देर
नज़र
ईद
का
चाँद
तो
फिर
बाद
में
देखा
मैंने
Vijendra Singh Parwaaz
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दिलों
की
बातें
दिलों
के
अंदर
ज़रा
सी
ज़िद
से
दबी
हुई
हैं
वो
सुनना
चाहें,
ज़ुबां
से
सब
कुछ
मैं
करना
चाहूँ
नज़र
से
बतियां
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है
सुलगती
सांसें,
तरसती
आँखें,
मचलती
रूहें,
धड़कती
छतियां
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Aalok Shrivastav
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सुख़न
की
दुनिया
में
आक़िब
नए
नहीं
हो
तुम
तुम्हारे
जैसे
यहाँ
कितने
ख़ाक
छानते
हैं
Aqib khan
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वो
मुझे
याद
कर
रही
होगी
रात
तारों
को
ताकती
होगी
एक
लड़की
जो
तुमको
चाहेगी
देख
लेना
वो
सिरफिरी
होगी
पूछते
क्यूँ
हो
उसके
बारे
में
वो
हवा
थी
वो
बह
गई
होगी
सोच
में
अब
तलक
पड़ा
हूँ
मैं
क्या
मुझे
भी
वो
सोचती
होगी
जो
मेरी
उसके
साथ
गुज़रेगी
यार
क्या
ख़ूब
ज़िन्दगी
होगी
ख़त
रखा
था
जो
उसकी
कॉपी
में
उसने
वो
कॉपी
देख
ली
होगी
जाने
की
वजह
ही
बता
देता
कुछ
न
कुछ
बात
तो
हुई
होगी
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Aqib khan
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वफ़ादारों
की
वफ़ादारियों
से
डर
गया
हूँ
मैं
अपने
लोगों
की
मक्कारियों
से
डर
गया
हूँ
ज़माने
भर
में
मचे
बेतहाशा
शोर
के
बीच
दिल-ए-तन्हा
तेरी
लाचारियों
से
डर
गया
हूँ
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Aqib khan
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इस
में
तेरी
खता
नहीं
है
दोस्त
हम
तो
ख़ुद
को
समझ
नहीं
आते
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Aqib khan
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सादापने
को
देख
के
आया
वो
एक
शख़्स
पेचीदगी
को
जान
के
रुख़्सत
भी
हो
चुका
Aqib khan
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