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Manish
rooh ke zaKHm kii sab davaa mil gaii
rooh ke zaKHm kii sab davaa mil gaii | रूह के ज़ख़्म की सब दवा मिल गई
- Manish
रूह
के
ज़ख़्म
की
सब
दवा
मिल
गई
जब
मोहब्बत
की
तेरे
हवा
मिल
गई
- Manish
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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उड़ने
दो
परिंदों
को
अभी
शोख़
हवा
में
फिर
लौट
के
बचपन
के
ज़माने
नहीं
आते
Bashir Badr
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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बहुत
सी
कश्तियाँ
डूबी
जहाँ
पर
हवा
की
साजि़शें
गहरी
बहुत
थी
Umesh Maurya
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देख
तो
दिल
कि
जाँ
से
उठता
है
ये
धुआँ
सा
कहाँ
से
उठता
है
गोर
किस
दिलजले
की
है
ये
फ़लक
शोला
इक
सुब्ह
यां
से
उठता
है
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Meer Taqi Meer
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तरीक़े
और
भी
हैं
इस
तरह
परखा
नहीं
जाता
चराग़ों
को
हवा
के
सामने
रक्खा
नहीं
जाता
मोहब्बत
फ़ैसला
करती
है
पहले
चंद
लम्हों
में
जहाँ
पर
इश्क़
होता
है
वहाँ
सोचा
नहीं
जाता
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Abrar Kashif
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न
रूई
हो
तो
अपने
अश्कों
से
बाती
बनाएँगे
बुझा
दीया
हमारा
तो
हवा
से
लड़
भी
जाएँगे
बनाई
रोज़
चौदह
साल
रंगोली
बस
इस
ख़ातिर
न
जाने
रामजी
वनवास
से
कब
लौट
आएंँगे
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Krishnakant Kabk
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कमरे
में
सिगरेटों
का
धुआँ
और
तेरी
महक
जैसे
शदीद
धुँध
में
बाग़ों
की
सैर
हो
Umair Najmi
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चराग़ों
को
उछाला
जा
रहा
है
हवा
पर
रौब
डाला
जा
रहा
है
Rahat Indori
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प्यार
में
हद
से
मैं
गुज़र
जाता
जिस्म
से
रूह
तक
उतर
जाता
देखते
जो
मेरी
निगाहों
में
इश्क़
का
तुम
में
भी
असर
जाता
है
वफ़ा
में
मेरी
बहुत
शिद्दत
कहते
तुम
प्यार
से
तो
मर
जाता
टूट
जाता
अगर
ये
दिल
मेरा
काँच
के
जैसे
मैं
बिखर
जाता
बे-वफ़ाई
का
ग़म
मेरा
देखा
सुन
सदाऍं
ख़ुदा
उतर
जाता
है
उदासी
सी
ज़िंदगी
अपनी
देख
कर
मैं
तुझे
निखर
जाता
दे
रही
है
हवा
पता
तेरा
खोजने
तुझको
मैं
जिधर
जाता
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Manish
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इक
समुंदर
ने
डुबोने
की
मुझे
साज़िश
की
है
मैंने
बन
तूफ़ान
फिर
से
उठने
की
कोशिश
की
है
Manish
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मुहब्बत
इबादत
है
ख़ुदा
की
इनायत
है
मुझे
जाॅं
से
भी
प्यारी
तू
और
यह
रफ़ाक़त
है
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Manish
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इश्क़
में
लो
चोट
खाना
आ
गया
दर्द
को
दिल
से
मिटाना
आ
गया
सब
दु'आ
माँ
की
हिफ़ाज़त
कर
रही
और
फ़रिश्ता
जी
बचाने
आ
गया
ठोकरों
से
ज़िंदगी
की
सीख
ली
हाथ
दुश्मन
से
मिलाना
आ
गया
प्यार
भी
तो
बंदगी
है
कुछ
नहीं
यह
परस्तिश
भी
निभाना
आ
गया
हमको
उल्फ़त
के
मुबारक
ग़म
सभी
ज़ख़्म
खा
कर
मुस्कुराना
आ
गया
दर्द
का
रिश्ता
है
क्या
इक
दोस्त
से
दोस्त
ग़म
में
यह
बताने
आ
गया
मैं
सुनाऊँ
चल
तुझे
अच्छी
ग़ज़ल
सामने
चेहरा
सुहाना
आ
गया
ज़िंदगी
लो
फिर
मुकम्मल
हो
गई
जब
से
हम
को
ज़ख़्म
खाना
आ
गया
हम
तेरी
जब
से
गली
रहने
लगे
प्यार
का
क़िस्सा
सुनाना
आ
गया
वक़्त
अच्छा
या
बुरा
ही
क्यूँ
न
हो
हम
को
तो
हॅंस
कर
बिताना
आ
गया
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Manish
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दुश्मनी
मुल्कों
की
ही
मासूमियत
है
खा
गईं
वहशतें
ही
इस
वजह
से
ज़ेहन
पर
हैं
छा
गईं
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