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Nishad
dost bhi hai ishq bhi hai lekin in
dost bhi hai ishq bhi hai lekin in | दोस्त भी है, इश्क़ भी है, लेकिन इन
- Nishad
दोस्त
भी
है,
इश्क़
भी
है,
लेकिन
इन
में
दर्द
भी
है
इसलिए
तो
ज़िंदगी
के
फ़लसफ़े
में
शा'इरी
है
- Nishad
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कभी
हँसता
हूँ
तो
आँखें
कभी
मैं
नम
भी
रखता
हूँ
हर
इक
मुस्कान
के
पीछे
हज़ारों
ग़म
भी
रखता
हूँ
शिफ़ा
भी
दे
नहीं
सकता
मुझे
कोई
मेरा
अपना
नतीजन
मैं
मिरे
ज़ख़्मों
का
ख़ुद
मरहम
भी
रखता
हूँ
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Shubham Dwivedi
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पुराने
घाव
पर
नाखून
उसका
लग
गया
वरना
गुज़र
कर
दर्द
ये
हद
से
दवा
होने
ही
वाला
था
Atul K Rai
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दर्द
मिन्नत-कश-ए-दवा
न
हुआ
मैं
न
अच्छा
हुआ
बुरा
न
हुआ
Mirza Ghalib
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उनके
दुखों
को
शे'र
में
कहना
तो
था
मगर
लड़के
समझ
न
पाएँ
कभी
लड़कियों
का
दुख
Ankit Maurya
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ऐ
ग़म-ए-ज़िंदगी
न
हो
नाराज़
मुझ
को
आदत
है
मुस्कुराने
की
Abdul Hamid Adam
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पास
जब
तक
वो
रहे
दर्द
थमा
रहता
है
फैलता
जाता
है
फिर
आँख
के
काजल
की
तरह
Parveen Shakir
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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तू
अपने
सारे
दुख
जाकर
बताता
है
जिन्हें,
इक
दिन
बढ़ाएँगे
वही
ग़म-ख़्वार
तेरी
आँख
का
पानी
Siddharth Saaz
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हम
अपने
दुख
को
गाने
लग
गए
हैं
मगर
इस
में
ज़माने
लग
गए
हैं
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Madan Mohan Danish
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ज़रा
सा
ग़म
हुआ
और
रो
दिए
हम
बड़ी
नाज़ुक
तबीअत
हो
गई
है
Shahzad Ahmad
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तुम
सेे
बिछड़े
हैं
तो
कलेंडर
ये
तबसे
बस
फ़रवरी
में
अटका
है
Nishad
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देख
कर
तेरी
नज़ाकत,
ज़ेब-ओ-ज़ीनत
आइना
भी
तुझ
सेा
बनते
जा
रहा
है
Nishad
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भटकते
फिर
रहा
है
इक
बदन
से
दूसरे
तक
ग़म
अब
इस
ग़म
को
थकन
के
मारे
बस
जी
भर
के
रोना
है
Nishad
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खा
रहा
है
कबसे
मुझको
इक
सवाल
ज़िंदगी
ज़िंदा
रखेगी
कब
तलक
Nishad
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अब
इस
सेे
बेहतर
कैसे
समझाता
मैं
ख़ाली-पन
उसे
मैंने
उसे
ख़त
भेजा
और
ख़त
में
लिखा
कुछ
भी
नहीं
Nishad
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