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Nishad
bhatkte phir raha hai ik badan se doosre tak gham
bhatkte phir raha hai ik badan se doosre tak gham | भटकते फिर रहा है इक बदन से दूसरे तक ग़म
- Nishad
भटकते
फिर
रहा
है
इक
बदन
से
दूसरे
तक
ग़म
अब
इस
ग़म
को
थकन
के
मारे
बस
जी
भर
के
रोना
है
- Nishad
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आधी
से
ज़ियादा
शब-ए-ग़म
काट
चुका
हूँ
अब
भी
अगर
आ
जाओ
तो
ये
रात
बड़ी
है
Saqib lakhanavi
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तू
तो
वाक़िफ़
है
रिवाज़-ए-ग़म
से
इसके
इश्क़
तो
तेरा
भी
ये
पहला
नहीं
है
Siddharth Saaz
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ये
तुम
सब
मिल
के
जो
कुछ
कह
रहे
हो
मैं
कह
सकता
हूँ
पर
कहना
नहीं
है
हमारा
शे'र
भी
सुनने
न
आएँ
हमारा
दुख
जिन्हें
सहना
नहीं
है
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Ali Zaryoun
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तेरे
जाने
से
ज़्यादा
हैं
न
कम
पहले
थे
हम
को
लाहक़
हैं
वही
अब
भी
जो
ग़म
पहले
थे
Afzal Khan
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ग़म-ए-दुनिया
भी
ग़म-ए-यार
में
शामिल
कर
लो
नश्शा
बढ़ता
है
शराबें
जो
शराबों
में
मिलें
Ahmad Faraz
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यही
बहुत
है
मिरे
ग़म
में
तुम
शरीक
हुए
मैं
हॅंस
पड़ूँगा
अगर
तुमने
अब
दिलासा
दिया
Imran Aami
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खुशियाँ
उसी
के
साथ
हैं
जो
ग़म
गुसार
है
ऐसे
हरेक
शख़्स
ही
दुनिया
का
यार
है
Sunny Seher
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वो
जिसकी
याद
ने
जीना
मुहाल
कर
रखा
है
उसी
की
आस
ने
मुझको
सँभाल
कर
रखा
है
सियाह
रातों
में
साए
से
बातें
करता
है
तुम्हारे
ग़म
ने
नया
रोग
पाल
कर
रखा
है
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Harsh saxena
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अब
ये
सोचा
है
बस
ख़ुश
रहेंगे
दिल
उदासी
से
उकता
गया
है
Sapna Moolchandani
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दुनिया
की
फ़िक्र
छोड़,
न
यूँँ
अब
उदास
बैठ
ये
वक़्त
रब
की
देन
है,
अम्मी
के
पास
बैठ
Salman Zafar
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आपको
लम्स
भी
मुयस्सर
है
मुझको
दीदार
तक
नसीब
नहीं
Nishad
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खा
रहा
है
कबसे
मुझको
इक
सवाल
ज़िंदगी
ज़िंदा
रखेगी
कब
तलक
Nishad
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देख
कर
तेरी
नज़ाकत,
ज़ेब-ओ-ज़ीनत
आइना
भी
तुझ
सेा
बनते
जा
रहा
है
Nishad
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तुम
सेे
बिछड़े
हैं
तो
कलेंडर
ये
तबसे
बस
फ़रवरी
में
अटका
है
Nishad
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अब
इस
सेे
बेहतर
कैसे
समझाता
मैं
ख़ाली-पन
उसे
मैंने
उसे
ख़त
भेजा
और
ख़त
में
लिखा
कुछ
भी
नहीं
Nishad
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