kis qadar mahdood kar deta hai gham insaan ko | किस क़दर महदूद कर देता है ग़म इंसान को

  - Zeeshan Sahil
किसक़दरमहदूदकरदेताहैग़मइंसानको
ख़त्मकरदेताहैहरउम्मीदहरइम्कानको
गीतगाताभीनहींघरकोसजाताभीनहीं
औरबदलताभीनहींवोसाज़कोसामानको
इतनेबरसोंकीरियाज़तसेजोक़ाएमहोसका
आपसेख़तराबहुतहैमेरेइसईमानको
कोईरुकताहीनहींइसकीतसल्लीकेलिए
देखतारहताहैदिलहरअजनबीमेहमानको
अबतोयेशायदकिसीभीकामसकतानहीं
आपहीलेजाइएमेरेदिल-ए-नादानको
शहरवालोंकोतोजैसेकुछपताचलतानहीं
रोकतारहताहैसाहिलरोज़-ओ-शबतूफ़ानको
  - Zeeshan Sahil
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