bade mulk ke ik bade shahar ki | बड़े मुल्क के इक बड़े शहर की

  - Zafar Sayyad
बड़ेमुल्ककेइकबड़ेशहरकी
तंग-ओ-तीरागलीमेंखड़ाहूँ
फ़लक
ऊँचेबुर्जोंकेभालोंसेकटकरउफ़क़ता-उफ़ुक़किरचीकिरचीपड़ाहै
ज़मीं
पाँवकेनीचेबदमस्तकश्तीकीमानिंदहचकोलेखातीहै
औरमैंखड़ासोचताहूँ
किदस्तारकोदोनोंहाथोंसेथामूँ
किफ़ुटपाथकीगिरतीदीवारसे
अपनेसरकोबचाऊँ
  - Zafar Sayyad
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy