हर आदमी कहाँ औज-ए-कमाल तक पहुँचा

  - Zafar Iqbal Zafar
हरआदमीकहाँऔज-ए-कमालतकपहुँचा
उरूजहदसेबढ़ातोज़वालतकपहुँचा
ख़ुदअपनेआपमेंझुँझलाकेरहगयाआख़िर
मेराजवाबजबउसकेसवालतकपहुँचा
ग़ुबार-ए-किज़्बसेधुँदलारहाहमेशाजो
वोआइनामेरेकबख़द्द-ओ-ख़ालतकपहुँचा
चलोसरकोउठाकरग़ुरूरसेअपना
गिराहैजोभीबुलंदीसेढालतकपहुँचा
जिसेभरोसानहींथाउड़ानपरअपनी
वहीपरिंदाशिकारीकेजालतकपहुँचा
तवाफ़करतेरहेसबहीरास्तेमेंमगर
हरएकशख़्सहीगर्द-ए-मलालतकपहुँचा
मेरीनजातकाहोगा'ज़फ़र'वसीलावही
जोलफ़्ज़ना'तकामेरेख़यालतकपहुँचा
  - Zafar Iqbal Zafar
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