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Zeeshan kaavish
vo muhabbat ka talabgaar nahin ho saktaa
vo muhabbat ka talabgaar nahin ho saktaa | वो मुहब्बत का तलबगार नहीं हो सकता
- Zeeshan kaavish
वो
मुहब्बत
का
तलबगार
नहीं
हो
सकता
जो
सितमगर
है
उसे
प्यार
नहीं
हो
सकता
तेरे
होते
हुए
जो
चाँद
का
दीदार
करे
कुछ
भी
होगा
वो
समझदार
नहीं
हो
सकता
- Zeeshan kaavish
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तुझे
ये
दोस्त
अपना
फिर
पुराना
याद
आएगा
तुझे
फिर
ये
मुहब्बत
का
ज़माना
याद
आएगा
तू
जितनी
कोशिशें
करले
भुलाने
की
मुझे
लेकिन
तुझे
अंदाज़
मेरा
शायराना
याद
आएगा
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तुझ
सेे
बिछडूँगा
तो
पागल
नहीं
होने
वाला
हाँ
मगर
सच
है
मुकम्मल
नहीं
होने
वाला
कोई
नुक़सान
नहीं
होगा
उसे
पाने
में
वो
खरा
सोना
है
पीतल
नहीं
होने
वाला
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ऐसी
हालत
नहीं
हुई
होती
गर
मुहब्बत
नहीं
हुई
होती
ज़िंदगी
किस
तरह
बसर
करते
तेरी
चाहत
नहीं
हुई
होती
हम
दीवानों
पे
वो
ही
हँसता
है
जिसको
उल्फ़त
नहीं
हुई
होती
रफ़्ता
रफ़्ता
तुझे
भुलाते
अगर
तेरी
आदत
नहीं
हुई
होती
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Zeeshan kaavish
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उसी
दम
तक
समझ
लेना
तेरी
पहचान
बाक़ी
है
कि
जब
तक
रूह
में
कुछ
गर्मी
ऐ
ईमान
बाक़ी
है
ये
कह
दो
नफरतों
की
आंधियों
से
होश
में
रहना
मेरे
दिल
में
मुहब्बत
का
अभी
तूफ़ान
बाक़ी
है
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Zeeshan kaavish
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सच
मान
जैसा
चाहा
था
वैसा
नहीं
मिला
कोई
भी
इस
जहान
में
तुझ
सेा
नहीं
मिला
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