fikr-e-baalida ki nudrat se nikhrate hain khayal | फ़िक्र-ए-बालीदा की नुदरत से निखरते हैं ख़याल

  - Yusuf Qamar
फ़िक्र-ए-बालीदाकीनुदरतसेनिखरतेहैंख़याल
औरअगरज़ेहन-ए-रसाहोतोसँवरतेहैंख़याल
अक़्लकबकरतीहैफ़र्सूदाख़यालोंकोक़ुबूल
फ़िक्रबेदारअगरहोतोउभरतेहैंख़याल
जिद्दत-ए-फ़िक्रसेअफ़्कारकोमिलतीहैनुमू
हुस्न-ए-किरदारकीराहोंसेगुज़रतेहैंख़याल
ज़ह्नख़ालिक़हैख़यालातकातस्लीममगर
ज़ह्नपरसूरत-ए-इल्हामउतरतेहैंख़याल
सोहबतइक़बालकीअफ़्कारकोदेतीहैजिला
उनकीसोहबतमेंबहुतख़ूबनिखरतेहैंख़याल
मुंतशिरज़ह्नअगरहोतोनतीजामालूम
सूरत-ए-काहहवाओंमेंबिखरतेहैंख़याल
ज़ह्नकोफ़िक्रकीतहरीकजोमिलजाए'क़मर'
महशरिस्तानकीसूरतमेंगुज़रतेहैंख़याल
  - Yusuf Qamar
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