kal shaam nahar ki patri ke saath saath | कल शाम नहर की पटरी के साथ साथ

  - Yusuf Kamran
कलशामनहरकीपटरीकेसाथसाथ
मैंअपनेना-तवाँकंधोंपर
एकशिकस्ताबोरीउठाएजारहाथा
किचीख़-ओ-पुकारशुरूअ'हुई
पकड़ोपकड़ोक़ातिलक़ातिल
नहरपरमुतअय्यनपुलीसचौकीकेमुस्तइदअमलेने
संगीनोंसेमेरातआ'क़ुबकिया
मैंअपनीतमाम-तरक़ुव्वतसेभागनेकेबावजूद
चंदहीलम्होंमेंउनकीआहनीगिरफ़्तमेंथा
पुलीसचौकीमेंसवालोंकीबोछाड़से
मेरीक़ुव्वत-ए-गोयाईजवाबदेगई
एकमकरूहसूरतमोंछोंवालाबा-वर्दीशख़्स
वहशत-नाकआँखोंसेअमलेकीतरफ़देखतेहुए
अपनीशदीदकरख़्तआवाज़मेंचीख़ा
बोरीकामुँहखोलो
साराअमलाशश्दररहगया
किबोरीमेंलिपटीहुईलाशमेरीहीथी
औरमैंचुपसाधेउसेतकरहाथा
  - Yusuf Kamran
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