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Yawar Amaan
beenaai bhi apni meri
beenaai bhi apni meri | बीनाई भी अपनी मेरी
- Yawar Amaan
बीनाई
भी
अपनी
मेरी
ख़्वाब
भी
मेरे
अपने
हैं
बीनाई
भी
सच्ची
मेरी
ख़्वाब
भी
मेरे
सच्चे
हैं
इन
दोनों
की
लज़्ज़त
सच्ची
और
अज़िय्यत
भी
सच्ची
मुझ
को
ये
मा'लूम
तो
है
कि
तुम
मेरे
और
मुझ
जैसे
लाखों
लोगों
के
ख़्वाबों
से
नफ़रत
करते
रहते
हो
और
उस
की
ता'बीर
के
बदले
भूक
इफ़्लास
ग़रीबी
और
महरूमी
के
दरवाज़े
वा
करते
ही
रहते
हो
और
उन
दरवाज़ों
के
ज़रीये
बीमार
उजाले
नस्लों
तक
फैलाते
हो
दहशत-गर्द
बनाते
हो
लेकिन
तुम
ने
कब
सोचा
है
जलती
और
दहकती
रातें
वक़्त
का
चलता
पहिया
यकसर
आम
नहीं
कर
सकती
हैं
मेरी
आँखों
की
बीनाई
मेरे
ख़्वाबों
की
सच्चाई
मुझ
से
छीन
नहीं
सकती
फिर
भी
सुन
लो
अज़्म
है
अपना
जब
तक
आँखों
की
बीनाई
जब
तक
अपने
ख़्वाब
सलामत
तेज़
नज़र
ना-बीनाओं
को
अपने
ख़्वाब
नहीं
बेचेंगे
चाहे
कुछ
हो
चाहे
ध्यान
गँवा
दें
अपना
चाहे
अपनी
जान
भी
जाए
- Yawar Amaan
हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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रंग-ओ-रस
की
हवस
और
बस
मसअला
दस्तरस
और
बस
यूँँ
बुनी
हैं
रगें
जिस्म
की
एक
नस
टस
से
मस
और
बस
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Ammar Iqbal
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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ये
क़त्ल-ए-आम
और
बे-इज़्न
क़त्ल-ए-आम
क्या
कहिए
ये
बिस्मिल
कैसे
बिस्मिल
हैं
जिन्हें
क़ातिल
नहीं
मिलता
वहाँ
कितनों
को
तख़्त
ओ
ताज
का
अरमाँ
है
क्या
कहिए
जहाँ
साइल
को
अक्सर
कासा-ए-साइल
नहीं
मिलता
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Asrar Ul Haq Majaz
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याद
आई
तिरे
पैरों
की
खनकती
पायल
आम
सा
प्रश्न
था
संगीत
किसे
कहते
हैं
Neeraj Neer
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तुम
अगर
सीखना
चाहो
मुझे
बतला
देना
आम
सा
फ़न
तो
कोई
है
नहीं
तोहफ़ा
देना
Jawwad Sheikh
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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तेग़-बाज़ी
का
शौक़
अपनी
जगह
आप
तो
क़त्ल-ए-आम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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तुम
वो
लड़की
मुझे
लगती
तो
नहीं
आम
गोपी
से
जो
राधा
हो
जाए
Shariq Kaifi
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मोहब्बत
आम
सा
इक
वाक़िआ'
था
हमारे
साथ
पेश
आने
से
पहले
Sarfraz Zahid
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