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Vishna prajapati
thokar khaai jab dar dar ke aage
thokar khaai jab dar dar ke aage | ठोकर खाई जब दर दर के आगे
- Vishna prajapati
ठोकर
खाई
जब
दर
दर
के
आगे
आख़िर
आया
अपने
घर
के
आगे
क्या
क्या
सोचा
था
मैं
करने
का
पर
नइँ
आ
पाया
हूँ
दफ़्तर
के
आगे
- Vishna prajapati
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ख़ुद
का
रोना
ख़ुद
ही
रोना
पड़ता
है
आख़िर
में
फिर
हमको
सोना
पड़ता
है
उसके
मिलने
पर
तू
इतना
क्यूँ
राज़ी
आख़िर
में
जब
उसको
खोना
पड़ता
है
दुनिया
का
भी
दस्तर
तो
अब
ऐसा
है
उनके
जैसा
हमको
होना
पड़ता
हैं
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यही
सोचकर
दिल
दिया
ही
नहीं
भला
दिल
भी
देते
हैं
क्या
सोच
कर
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मिरे
दिल
में
खटकती
ही
रही
इक
बात
है
कोई
सभी
ने
जब
ये
पूछा
उसकी
अब
सौग़ात
है
कोई
जिसे
उठना
सिखाया
है
जिसे
चलना
सिखाया
था
मुझी
से
आज
कहता
है
तेरी
औक़ात
है
कोई
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उसे
भी
आ
गया
मतलब
का
रोना
मुझे
भी
भा
गया
मतलब
का
रोना
ज़रा
सी
भी
नहीं
उसको
तजावुज़
मुझे
ही
खा
गया
मतलब
का
रोना
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ख़ुद
का
रोना
ख़ुद
ही
रोना
पड़ता
है
आख़िर
में
फिर
हमको
सोना
पड़ता
है
उसके
मिलने
पर
तू
इतना
क्यूँ
राज़ी
आख़िर
में
जब
उसको
खोना
पड़ता
है
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