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Umesh Maurya
sab ne apne raam banaa kar rakhe hain
sab ne apne raam banaa kar rakhe hain | सब ने अपने राम बना कर रक्खे हैं
- Umesh Maurya
सब
ने
अपने
राम
बना
कर
रक्खे
हैं
मन
माफिक
आराम
बना
कर
रक्खे
हैं
- Umesh Maurya
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थकना
भी
लाज़मी
था
कुछ
काम
करते
करते
कुछ
और
थक
गया
हूँ
आराम
करते
करते
Zafar Iqbal
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ईद
के
रोज़
यही
अपनी
दु'आ
है
रब
से
मुल्क
में
अमन
का,
उलफ़त
का
बसेरा
हो
जाए
हर
परेशानी
से
हर
शख़्स
को
मिल
जाए
नजात
इस
सियह
रात
का
बस
जल्द
सवेरा
हो
जाए
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Zaki Azmi
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मुसीबतों
में
तो
याद
करते
ही
हैं
किसी
को
ये
लोग
सारे
मगर
कभी
जो
सुकूँ
में
आए
ख़याल
मेरा
तो
लौट
आना
Hasan Raqim
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सुकून
क़ल्ब
को
जिस
से
मिल
जाए
'ताबाँ'
ग़ज़ल
कोई
ऐसी
सुना
दीजिएगा
Anwar Taban
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बैठे
हैं
चैन
से
कहीं
जाना
तो
है
नहीं
हम
बे-घरों
का
कोई
ठिकाना
तो
है
नहीं
तुम
भी
हो
बीते
वक़्त
के
मानिंद
हू-ब-हू
तुम
ने
भी
याद
आना
है
आना
तो
है
नहीं
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Rehman Faris
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तुम
न
आए
तो
क्या
सहर
न
हुई
हाँ
मगर
चैन
से
बसर
न
हुई
मेरा
नाला
सुना
ज़माने
ने
एक
तुम
हो
जिसे
ख़बर
न
हुई
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Mirza Ghalib
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चार
दिन
झूठी
बाहों
के
आराम
से
मेरी
बिखरी
हुई
ज़िंदगी
ठीक
है
दोस्ती
चाहे
जितनी
बुरी
हो
मगर
प्यार
के
नाम
पर
दुश्मनी
ठीक
है
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SHIV SAFAR
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होगा
किसी
दीवार
के
साए
में
पड़ा
'मीर'
क्या
रब्त
मोहब्बत
से
उस
आराम-तलब
को
Meer Taqi Meer
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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बे
तेरे
क्या
वहशत
हम
को
तुझ
बिन
कैसा
सब्र-ओ-सुकूँ
तू
ही
अपना
शहर
है
जानी
तू
ही
अपना
सहरा
है
Ibn E Insha
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उसे
महसूस
भी
होने
न
दूँगा
कि
उसके
प्यार
में
मैं
मर
चुका
हूँ
Umesh Maurya
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भर
लिया
है
आँख
में
तुम
को
दिखे
तो
क्या
दिखे
अब
दिखे
तो
हर
किसी
में
कुछ
न
कुछ
तुम
सा
दिखे
Umesh Maurya
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ज़ुबाँ
में
जो
था
दिल
में
तो
नहीं
था
मेरे
कहने
का
मतलब
वो
नहीं
था
Umesh Maurya
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मेरी
आदत
नहीं
थी
झूठ
बोलूँ
इसी
आदत
नें
मुझको
ले
डुबोया
Umesh Maurya
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जब
होता
है
तब
होता
है
दर्द
हमेशा
कब
होता
है
मिलते
हैं
बस
हाथ
हमेशा
दिल
से
मिलना
कब
होता
है
नाकों
वाली
बस्ती
में
भी
चुपके
छुपके
सब
होता
है
असली
सूरत
देखो
उनकी
पीना
खाना
जब
होता
है
लगता
नहीं
उमेश
अब
ऐसा
अच्छों
का
भी
रब
होता
है
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Umesh Maurya
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