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Salma Malik
maa-baap se badhkar na daulat doosri
maa-baap se badhkar na daulat doosri | माँ-बाप से बढ़कर न दौलत दूसरी
- Salma Malik
माँ-बाप
से
बढ़कर
न
दौलत
दूसरी
उनकी
मुहब्बत
सी
न
जन्नत
दूसरी
हम
कातिबों
को
है
किताबत
लाज़मी
इस
सेे
है
बढ़कर
अब
न
शोहरत
दूसरी
क्या
हम
बताएँ
ये
ग़ज़लगोई
है
क्या
हमको
मिली
ऐसी
न
नेमत
दूसरी
क्यूँ
यूँँ
गँवाए
चार
दिन
की
ज़िन्दगी
हमको
मिलेगी
फिर
न
मोहलत
दूसरी
सारी
शिकायत
ठीक
हैं
'सलमा'
मगर
है
बेवफ़ाई
सी
न
तोहमत
दूसरी
- Salma Malik
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न
जाने
कौन
सी
दौलत
अता
करता
है
रब
इनको
किसी
भी
बाप
को
मुफ़्लिस
कभी
देखा
नहीं
मैंने
Saheb Shrey
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देर
से
आने
पर
वो
ख़फ़ा
था
आख़िर
मान
गया
आज
मैं
अपने
बाप
से
मिलने
क़ब्रिस्तान
गया
Afzal Khan
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गर
ये
अच्छी
क़िस्मत
है
तो
लानत
ऐसी
क़िस्मत
पर
अपने
फोन
में
देख
रहे
हैं,
बाप
को
बूढ़ा
होते
हम
Siddharth Saaz
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बेटियाँ
बाप
की
आँखों
में
छुपे
ख़्वाब
को
पहचानती
हैं
और
कोई
दूसरा
इस
ख़्वाब
को
पढ़
ले
तो
बुरा
मानती
हैं
Iftikhar Arif
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माँ
की
दु'आ
न
बाप
की
शफ़क़त
का
साया
है
आज
अपने
साथ
अपना
जनम
दिन
मनाया
है
Anjum Saleemi
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बीस
बरस
तक
बाप
उधड़ता
है
थोड़ा
थोड़ा
तब
सिलता
है
इक
बेटी
की
शादी
का
जोड़ा
Tanoj Dadhich
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कौन
सी
बात
कहाँ
कैसे
कही
जाती
है
ये
सलीक़ा
हो
तो
हर
बात
सुनी
जाती
है
एक
बिगड़ी
हुई
औलाद
भला
क्या
जाने
कैसे
माँ-बाप
के
होंठों
से
हँसी
जाती
है
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Waseem Barelvi
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मैं
अपने
बाप
के
सीने
से
फूल
चुनता
हूँ
सो
जब
भी
साँस
थमी
बाग़
में
टहल
आया
Hammad Niyazi
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बाप
ज़ीना
है
जो
ले
जाता
है
ऊँचाई
तक
माँ
दु'आ
है
जो
सदा
साया-फ़गन
रहती
है
Sarfraz Nawaz
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इन
का
उठना
नहीं
है
हश्र
से
कम
घर
की
दीवार
बाप
का
साया
Unknown
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अच्छी
लगती
हैं
किताबें
कातिबों
को
और
लिखना
है
महज़
इक
शौक़
उनका
Salma Malik
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बैठिए
छाँव
में
आप
बेशक़
मगर
एक
पौधा
कभी
तो
ज़रा
सींचिए
Salma Malik
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ज़ीस्त
की
थी
जुस्तुजू
अब
भला
हम
क्या
करें
मौत
का
व्यापार
था
अब
जिएँ
या
हम
मरें
सम्त
सारी
हैं
कड़ी
मुश्किलें
'सलमा'
बड़ी
मौत
है
अब
आरज़ू
ज़ीस्त
का
फिर
क्या
करें
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Salma Malik
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हसरतें
इस
क़दर
भी
न
पाला
करो
दिल
मचलने
लगे
तो
सँभाला
करो
ये
सभी
के
लिए
क़ीमती
है
बहुत
यूँँ
किसी
की
न
इज़्ज़त
उछाला
करो
तीरगी
यूँँ
नहीं
ये
मिटेंगी
कभी
इन
चराग़ों
तले
भी
उजाला
करो
शोहरतें
भी
दिलाए
ग़ज़ल
शायरों
क़ाफ़िए
को
ज़रा
तुम
निराला
करो
ये
घुटन
मार
देगी
यूँँ
'सलमा'
तुम्हें
इस
सुख़न
में
दुखन
को
निकाला
करो
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Salma Malik
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दिल
ही
दिल
को
समझाता
है
दिल
ही
दिल
को
फुसलाता
है
हद
से
गर
ये
बढ़
जाए
तो
फिर
ये
आदत
बन
जाता
है
दौलत
शौहरत
रास
न
आए
जब
ये
नस
में
चढ़
जाता
है
दिल
न
लगाएँ
कह
दो
सब
सेे
दिल
का
लगाया
मर
जाता
है
दर्द-ए-दिल
को
चारा-गर
भी
ठीक
नहीं
फिर
कर
पाता
है
इश्क़
बड़ी
इक
बीमारी
है
इश्क़
बड़ा
ही
तड़पाता
है
आसाँ
नईं
है
जीना
सलमा
जीने
वाला
मर
जाता
है
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Salma Malik
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