jo ghazal gunguna raha tha vo | जो ग़ज़ल गुनगुना रहा था वो

  - ABhishek Parashar
जोग़ज़लगुनगुनारहाथावो
ख़ुदलिखीहैबतारहाथावो
महज़समझामज़ाक़लोगोंने
दर्दअपनासुनारहाथावो
मुस्कुराकरहरएकबातोंपर
अपनेग़मकोछुपारहाथावो
छोड़करमैंउसेबहुतख़ुशहूँ
सबकोरोकरबतारहाथावो
इतनाज़्यादाउदासरहताहै
एकदिनज़हरखारहाथावो
शा'इरीमेंउतारकरख़ुदको
ख़ुद-कुशीसेबचारहाथावो
इसलिएमैंकहींनहींजाता
एकदिनपासरहाथावो
  - ABhishek Parashar
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