उस ने इक बार भी पूछा नहीं कैसा हूँ मैं

  - Tariq Qamar
उसनेइकबारभीपूछानहींकैसाहूँमैं
ख़ुदकोभीजिसकेलिएहारकेबैठाहूँमैं
फूलहोनेकीसज़ाख़ूबमिलीहैमुझको
शाख़सेटूटकेगुल-दानमेंरक्खाहूँमैं
चलतारहताहूँतोलगताहैकोईसाथमेंहै
थककेबैठूँगातोयादआएगातन्हाहूँमैं
गुमहुआख़ुदमेंतोइकनुक़्ता-ए-मौहूमहुआ
मुन्कशिफ़होतेहीअतराफ़पेछायाहूँमैं
इससलीक़ेसेमुझेक़त्लकियाहैउसने
अबभीदुनियायेसमझतीहैकिज़िंदाहूँमैं
फिरअचानकयेहुआजीतगईयेदुनिया
मैंसमझताथाकिबसजीतनेवालाहूँमैं
वोभीरस्मनयहीपूछेगाकिकैसेहोतुम
मैंभीहँसतेहुएकहदूँगाकिअच्छाहूँमैं
  - Tariq Qamar
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