वो ज़ीस्त जो लज़्ज़त-कश-ए-आलाम रही है

  - Syed Fazlul Mateen
वोज़ीस्तजोलज़्ज़त-कश-ए-आलामरहीहै
वोज़ीस्ततेरेनामसेमंसूबहुईहै
क्यूँहिज्रकीशबमहकीतेरेक़ुर्बकीख़ुशबू
क्याकोईकलीयादकेगुलशनमेंखिलीहै
गुज़रेहुएलम्होकोईनक़्शउभारो
आईना-ए-तख़यीलपेअबगर्दजमीहै
इकहमहैंकिख़ाक-ए-रह-ए-जानाँमेंअभीतक
इकवोहैंकिउनकीवहीबेगाना-रवीहै
गर्दिश-ए-अय्यामकोईज़ख़्मनयाऔर
इकमोड़पेअब‘उम्र-ए-रवाँठहरगईहै
रूदाद-ए-ग़म-ए-दिलमैंसुनाऊँतुझेक्यूँँकर
मैंदेखरहाहूँतेरीआँखोंमेंनमीहै
अबगुज़रेहुएवक़्तकाकुछज़िक्रछेड़ो
मुश्किलसेतबी'अतमेरीक़ाबूमेंहुईहै
मुद्दतसेकिसीदर्दकातोहफ़ानहींआया
यागर्दिश-ए-अय्यामहमेंभूलगईहै
बाद-ए-सहरआजतोचुप-चापगुज़रजा
होनेदेज़रादेरअभीआँखलगीहै
मयलाओग़ज़लगाओक़रीबआओशब-ए-माह
शर्मिंदानिगाहोंसेहमेंदेखरहीहै
मतपूछकिक्याहमपेगुज़रतीहैतेरेबा'द
बैठेहैंजहाँसुब्हवहींशामहुईहै
हैअव्वल-ए-शबबज़्ममेंरंगआख़िर-ए-शबका
क्याशमअ'कोईवक़्तसेपहलेहीबुझीहै
  - Syed Fazlul Mateen
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