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Sohil Barelvi
jab nikalta hooñ main kabhi baahar
jab nikalta hooñ main kabhi baahar | जब निकलता हूँ मैं कभी बाहर
- Sohil Barelvi
जब
निकलता
हूँ
मैं
कभी
बाहर
ख़ुद
को
कमरे
में
छोड़
जाता
हूँ
- Sohil Barelvi
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अल्लाह
सब्र
दे
मुझे
दुख
से
निकाल
दे
फिर
ज़ोर
दे
रहा
हूँ
उसी
हादसे
पे
मैं
Sohil Barelvi
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जनम-दिन
आ
गया
है
फिर
हमारा
तेरे
तोहफ़े
नहीं
पहुँचे
अभी
तक
Sohil Barelvi
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सैकड़ों
हाथ
किसी
को
न
मुयस्सर
हों
ख़ुदा
एक
इंसान
ही
इंसान
की
ऊँगली
पकड़े
Sohil Barelvi
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कोई
झगड़ा
अब
न
होगा
यार
से
प्यार
की
बातें
करेंगे
प्यार
से
मुश्किलों
से
मुश्किलों
को
हल
किया
ख़ार
को
मैं
ने
निकाला
ख़ार
से
आज़माती
हैं
कभी
तो
कश्तियाँ
पार
सब
होते
नहीं
पतवार
से
अपनी
धुन
में
इक
परिंदा
कह
गया
ला
दे
इक
जंगल
मुझे
बाज़ार
से
आज
फिर
कुछ
लोग
मुझ
को
याद
आए
आज
फिर
कुछ
लोग
बोले
प्यार
से
कोई
तो
होगा
हमारा
फ़िक्र-मंद
कोई
तो
आवाज़
दे
उस
पार
से
चंद
साँसों
के
सहारे
है
मगर
कौन
मिलने
आ
रहा
बीमार
से
सामने
से
अनसुना
कोई
करे
कोई
सुनता
है
पस-ए-दीवार
से
कौन
अपना
या
पराया
कौन
है
सब
नज़र
आने
लगे
आसार
से
अब
हमारी
क्या
सुनोगे
जब
तुम्हें
बात
करनी
है
किसी
अग़्यार
से
सब्र
से
कुछ
काम
लो
सोहिल
मियाँ
और
भी
आने
हैं
दिन
दुश्वार
से
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Sohil Barelvi
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दूजी
वज्ह
से
दर
वा
नहीं
है
कोई
हम
से
रूठा
नहीं
है
सर
को
अपने
क्या
ढाँपे
हम
छत
पर
ही
जब
साया
नहीं
है
मुझ
को
जाना
तो
जानोगे
खोटा
सिक्का
खोटा
नहीं
है
दस्तक़
दो
हर
दूजे
घर
पर
हर
घर
का
दर
खुलता
नहीं
है
चलते
रहो
तुम
ये
खुलने
तक
जो
भी
गया
क्यूँँ
लौटा
नहीं
है
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Sohil Barelvi
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