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Shivang Tiwari
bahut kathin hai magar phir bhi chal ke dekhoonga
bahut kathin hai magar phir bhi chal ke dekhoonga | बहुत कठिन है मगर फिर भी चल के देखूँगा
- Shivang Tiwari
बहुत
कठिन
है
मगर
फिर
भी
चल
के
देखूँगा
मैं
एक
बार
तो
घर
से
निकल
के
देखूँगा
तवील
अर्से
से
मंज़िल
नहीं
मिली
तो
क्या
हदफ़
वही
है
मैं
रस्ता
बदल
के
देखूँगा
- Shivang Tiwari
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दूरियाँ
दो
किनारों
सी
थी
क्या
दरमियाँ
दोनों
के
नदी
थी
क्या
राख
और
धुंध
की
तमन्ना
में
कोई
सिगरेट
जल
रही
थी
क्या
जिसने
ओढ़ा
है
लम्स
तेरा
उसे
लग
रहा
सर्द
जनवरी
थी
क्या
शब
उसे
देख
सुब्ह
सब
ने
कहा
कल
अमावस
में
चाँदनी
थी
क्या
क्यूँ
मुझे
मौत
जीनी
पड़
रही
है
इक
वही
लड़की
ज़िन्दगी
थी
क्या
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Shivang Tiwari
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मेरी
बाहों
में
रहते
सिमटकर
नहीं
देखा
करते
दिल
ओ
जाँ
यूँँ
कटकर
नहीं
एक
हम
जो
तुम्हें
देखते
ही
रहे
दूसरे
तुम
जो
देखा
पलटकर
नहीं
दर्द
के
बीच
भी
मन
में
क्या
फाँस
है
क्यूँँ
वो
रोते
गले
से
लिपटकर
नहीं
बट
के
रहने
लगी
शय
जहाँ
की
हर
इक
देखा
रहते
हुए
माँ
को
बटकर
नहीं
शा'इरी
राऍंगा
ऐसे
तो
जाएगी
तेरा
अंदाज़
दुनिया
से
हटकर
नहीं
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Shivang Tiwari
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कुछ
ख़तों
को
लिखा
बस
वफ़ा
के
लिए
लफ़्ज़
फिर
कम
पड़े
हमनवा
के
लिए
रोकना
लौटना
टूटना
सब
हुआ
कल
मुझे
फिर
बुला
तू
ख़ुदा
के
लिए
कश्मकश
तिश्नगी
दफ़अतन
साथ
हैं
इश्क़
को
मत
भुला
कल
अना
के
लिए
आरज़ू
जुस्तुजू
सब
कहीं
छोड़
कर
अब
ज़रा
पास
आ
दिलरुबा
के
लिए
इक
ग़ज़ल
लिख
कभी
हुस्न
पर
जिस्म
पर
लफ़्ज़
भी
कम
नहीं
मर्हबा
के
लिए
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Shivang Tiwari
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दिल
की
चाहत
है
बस
ग़ज़ल
लिक्खूँ
मसअला
है
मगर
दो
रोटी
का
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चाँद
तुम
सेे
मुझे
है
शिकायत
बड़ी
सब
तुम्हारी
वजह
से
समस्या
खड़ी
रौशनी
की
वजह
से
वो
शर्माते
हैं
चाँदनी
को
छुपा
लो
घड़ी
दो
घड़ी
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