फूल से ढलका हुआ ओस का क़तरा हूँ मैं

  - Shaukat Wasti
फूलसेढलकाहुआओसकाक़तराहूँमैं
शाख़सेटूटकेगिरताहुआपत्ताहूँमैं
छोड़केचलदियाहैजैसेबदनहीमुझको
जिसकीपहचाननहींकोईवोसायाहूँमैं
जोकिदरआयाथारौज़नसेकिरनकेहमराह
तेरेकमरेमेंवोबे-फ़ाएदाज़र्राहूँमैं
वादी-ओ-कोह-ओ-बयाबाँसेगुज़रकरआख़िर
शहरमेंकेजोखोजाएवोरस्ताहूँमैं
अपनीआँखोंसेनज़रहीनहींआतामुझको
अपनेचेहरेकेलिएआपहीपर्दाहूँमैं
बूझकेऔरअदक़होवोमुअ'म्माहुईतू
खुलकेजोऔरउलझजाएवोउक़्दाहूँमैं
ख़ुदउजड़करकियाहैमैंनेकिसीकोआबाद
नक़्शमेंढलकेजोमिटजाएवोजज़्बाहूँमैं
मुद्दआ'हैकिमुकम्मलकरूँँतस्लीमउसे
कलजोकहताथातेरीज़ातकाहिस्साहूँमैं
'शौकत'इससीनेमेंमहसूसनहींअबवोभी
दिलकेबाइ'सेकभीदावाथाकिज़िंदाहूँमैं
  - Shaukat Wasti
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