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Shahzan Khan Shahzan'
aankhoñ se tere khwaab ke manzar nikaal ke
aankhoñ se tere khwaab ke manzar nikaal ke | आँखों से तेरे ख़्वाब के मंज़र निकाल के
- Shahzan Khan Shahzan'
आँखों
से
तेरे
ख़्वाब
के
मंज़र
निकाल
के
हम
सर्दियों
में
बैठे
हैं
चादर
निकाल
के
जब
तू
ही
देखने
को
मुयस्सर
नहीं
हमें
आँखों
को
रख
न
दें
कहीं
बाहर
निकाल
के
- Shahzan Khan Shahzan'
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तूने
देखी
है
वो
पेशानी
वो
रुख़्सार
वो
होंठ
ज़िंदगी
जिनके
तसव्वुर
में
लुटा
दी
हमने
तुझपे
उठी
हैं
वो
खोई
हुई
साहिर
आँखें
तुझको
मालूम
है
क्यूँ
उम्र
गंवा
दी
हमने
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Faiz Ahmad Faiz
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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ऐसा
है
कि
सब
ख़्वाब
मुसलसल
नहीं
होते
जो
आज
तो
होते
हैं
मगर
कल
नहीं
होते
Ahmad Faraz
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कटती
है
आरज़ू
के
सहारे
पे
ज़िंदगी
कैसे
कहूँ
किसी
की
तमन्ना
न
चाहिए
Shaad Arfi
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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हमको
हमारी
नींद
भी
वापस
नहीं
मिली
लोगों
को
उनके
ख़्वाब
जगा
कर
दिए
गए
Imran Aami
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उम्र
कम
पड़
जायेगी
हर
ख़्वाब
गर
पूरा
हुआ
और
गर
पूरा
न
हो
तो
काटती
है
ज़िंदगी
Ajeetendra Aazi Tamaam
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हम
उसे
आँखों
की
दहलीज़
न
चढ़ने
देते
नींद
आती
न
अगर
ख़्वाब
तुम्हारे
लेकर
एक
दिन
उसने
मुझे
पाक
नज़र
से
चूमा
उम्र
भर
चलना
पड़ा
मुझको
सहारे
लेकर
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Aalok Shrivastav
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ज़रा
सा
मुस्कुराओ
रौशनी
हो
बहुत
तंग
आ
गए
हम
तीरगी
से
Shahzan Khan Shahzan'
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तुमने
तो
मेरे
काम
सब
आसान
कर
दिए
खोने
को
मेरे
पास
में
कुछ
भी
बचा
नहीं
Shahzan Khan Shahzan'
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वो
आए
और
मेरा
हाल
चाल
पूछे
कुछ
बस
इस
लिए
ही
मैं
बीमार
होना
चाहता
हूँ
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Shahzan Khan Shahzan'
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गले
मिलना
है
हम
को
ज़िन्दगी
से
नहीं
हासिल
हुआ
कुछ
ख़ुद-कुशी
से
ज़रा
सा
मुस्कुराओ
रौशनी
हो
बहुत
तंग
आ
गए
हम
तीरगी
से
ये
रौशनदान
घर
का
बंद
कर
दो
कि
जुगनू
मर
रहे
हैं
रौशनी
से
ऐ
मेरे
दोस्त
झगड़ा
मत
करो
तुम
उठा
ले
जाओ
सब
कुछ
ख़ामुशी
से
बनी
है
जाँ
की
जो
मुश्किल
हमारी
निकल
कर
जा
रहे
हैं
उस
गली
से
जो
ग़म
में
साथ
न
दे
पाए
'शहज़ान'
भला
क्या
फ़ाइदा
उस
दोस्ती
से
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Shahzan Khan Shahzan'
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मुझको
अपना
बना
गया
कोई
ज़ख़्म
फिर
से
दुखा
गया
कोई
इसको
अपनी
बता
के
जादूगरी
तेरी
आँखें
बना
गया
कोई
हुस्न
वालों
की
एक
महफ़िल
में
मेरी
आँखों
को
भा
गया
कोई
एक
दुनिया
थी
ख़ुशबुओं
जैसी
उसके
धोखे
में
आ
गया
कोई
देर
तक
सोचता
रहा
तुमको
शे'र
ऐसा
सुना
गया
कोई
अपनी
यादों
के
रतजगे
देकर
मेरी
मुस्कान
खा
गया
कोई
इक
त'अल्लुक़
जो
मेरी
दुनिया
था
उसको
जड़
से
मिटा
गया
कोई
चाल
ऐसी
चली
गई
शहज़ान
हारी
बाज़ी
जिता
गया
कोई
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Shahzan Khan Shahzan'
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