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Shahzan Khan Shahzan'
roz do chaar log aate hai
roz do chaar log aate hai | रोज़ दो चार लोग आते है
- Shahzan Khan Shahzan'
रोज़
दो
चार
लोग
आते
है
उसकी
आँखों
के
गीत
गाते
हैं
मैं
उदासी
का
एक
मंज़र
हूँ
मुझ
सेे
मिलकर
ये
चैन
पाते
हैं
रात
बादल
सितारे
ग़म
आँसू
सब
मेरा
हौसला
बढ़ाते
हैं
तेरी
तस्वीर
कुछ
नहीं
कहती
बस
तेरे
होंठ
मुस्कुराते
हैं
किस
को
बोलूँ
उदास
लम्हों
में
वो
मुझे
ख़ूब
याद
आते
हैं
इश्क़
दुनिया
की
आख़िरी
हद
है
और
सब
इस
में
डूब
जाते
हैं
एक
पल
भी
अगर
मैं
हँस
लूँ
तो
लोग
कितना
मुझे
रुलाते
हैं
मेरी
तन्हाई
देखकर
शहज़ान
रास्ते
क़हक़हा
लगाते
हैं
- Shahzan Khan Shahzan'
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मेरा
बटुआ
नहीं
होता
है
ख़ाली
तेरी
तस्वीर
की
बरकत
रही
माँ
Satya Prakash Soni
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कोई
चेहरा
किसी
को
उम्र
भर
अच्छा
नहीं
लगता
हसीं
है
चाँद
भी,
शब
भर
मगर
अच्छा
नहीं
लगता
Munawwar Rana
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बहुत
मज़ाक़
उड़ाते
हो
तुम
ग़रीबों
का
मदद
तो
करते
हो
तस्वीर
खींच
लेते
हो
Nawaz Deobandi
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इक
गुल
के
मुरझाने
पर
क्या
गुलशन
में
कोहराम
मचा
इक
चेहरा
कुम्हला
जाने
से
कितने
दिल
नाशाद
हुए
Faiz Ahmad Faiz
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कल
चौदहवीं
की
रात
थी
शब
भर
रहा
चर्चा
तिरा
कुछ
ने
कहा
ये
चाँद
है
कुछ
ने
कहा
चेहरा
तिरा
Ibn E Insha
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उतर
गया
है
चेहरा
तेरे
जाने
से
लॉक
नहीं
खुलता
है
अब
मोबाइल
का
Tanoj Dadhich
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बद-नज़र
से
कभी
नहीं
देखा
तेरी
तस्वीर
भी
कुँवारी
है
Bhavesh Pathak
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भेज
देता
हूँ
मगर
पहले
बता
दूँ
तुझ
को
मुझ
से
मिलता
नहीं
कोई
मिरी
तस्वीर
के
बाद
Umair Najmi
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अपने
जैसी
कोई
तस्वीर
बनानी
थी
मुझे
मिरे
अंदर
से
सभी
रंग
तुम्हारे
निकले
Salim Saleem
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मैंने
इक
उम्र
से
बटुए
में
सँभाली
हुई
है
वही
तस्वीर
जो
इक
पल
नहीं
देखी
जाती
Jawwad Sheikh
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गले
मिलना
है
हम
को
ज़िन्दगी
से
नहीं
हासिल
हुआ
कुछ
ख़ुद-कुशी
से
ज़रा
सा
मुस्कुराओ
रौशनी
हो
बहुत
तंग
आ
गए
हम
तीरगी
से
ये
रौशनदान
घर
का
बंद
कर
दो
कि
जुगनू
मर
रहे
हैं
रौशनी
से
ऐ
मेरे
दोस्त
झगड़ा
मत
करो
तुम
उठा
ले
जाओ
सब
कुछ
ख़ामुशी
से
बनी
है
जाँ
की
जो
मुश्किल
हमारी
निकल
कर
जा
रहे
हैं
उस
गली
से
जो
ग़म
में
साथ
न
दे
पाए
'शहज़ान'
भला
क्या
फ़ाइदा
उस
दोस्ती
से
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Shahzan Khan Shahzan'
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बताते
हैं
तुम्हें
हम
क्या
मिलेगा
अगर
सच्चे
हो
तो
धोखा
मिलेगा
जन्मदिन
है
हमारा
आज
लेकिन
बताओ
क्या
कोई
तोहफ़ा
मिलेगा?
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Shahzan Khan Shahzan'
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एक
मुद्दत
गुज़ार
दी
मैंने
वो
भी
आँखें
तिरी
बनाने
में
Shahzan Khan Shahzan'
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बड़ी
दुश्वार
है
ये
जान
दुनिया
ज़रा
सा
ग़ौर
कर
पहचान
दुनिया
बहुत
पहले
मुझे
बोला
था
उसने
तुम्ही
हो
मेरी
अब
'शहज़ान'
दुनिया
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Shahzan Khan Shahzan'
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मुझको
अपना
बना
गया
कोई
ज़ख़्म
फिर
से
दुखा
गया
कोई
इसको
अपनी
बता
के
जादूगरी
तेरी
आँखें
बना
गया
कोई
हुस्न
वालों
की
एक
महफ़िल
में
मेरी
आँखों
को
भा
गया
कोई
एक
दुनिया
थी
ख़ुशबुओं
जैसी
उसके
धोखे
में
आ
गया
कोई
देर
तक
सोचता
रहा
तुमको
शे'र
ऐसा
सुना
गया
कोई
अपनी
यादों
के
रतजगे
देकर
मेरी
मुस्कान
खा
गया
कोई
इक
त'अल्लुक़
जो
मेरी
दुनिया
था
उसको
जड़
से
मिटा
गया
कोई
चाल
ऐसी
चली
गई
शहज़ान
हारी
बाज़ी
जिता
गया
कोई
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Shahzan Khan Shahzan'
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