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Adnan Ali SHAGAF
apne chehre se ukta ga.e hain
apne chehre se ukta ga.e hain | अपने चेहरे से उकता गए हैं
- Adnan Ali SHAGAF
अपने
चेहरे
से
उकता
गए
हैं
इस
दिखावे
से
उकता
गए
हैं
दिल
हमारा
अगर
है
खिलौना
इस
खिलौने
से
उकता
गए
हैं
पूछ
लेना
पहाड़ों
का
जीवन
जो
ज़माने
से
उकता
गए
हैं
इश्क़
है
बोरियत
का
फ़साना
और
वो
पहले
से
उकता
गए
हैं
दोस्ती
दिल-लगी
या
भरोसा
इस
हवाले
से
उकता
गए
हैं
एक
दिन
ख़ुद
कहोगी
'शगफ़'
को
इस
दिवाने
से
उकता
गए
हैं
- Adnan Ali SHAGAF
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जाने
क्यूँ
मैं
दिल
दे
बैठा
सर
पर
ये
मुश्किल
ले
बैठा
मेरी
इस
में
ख़ता
ही
क्या
है
दिल
ही
दिल
को
दिल
दे
बैठा
शहर
में
जिसके
दिल
नइँ
लगता
उस
शहरी
को
दिल
दे
बैठा
सफ़र
को
जारी
रखा
हुआ
है
होगा
वो
मंज़िल
पे
बैठा
उसके
पहलू
से
जा
लगे
सब
मैं
बेहद
मुश्किल
से
बैठा
अपनी
मिन्तक़
झाड़
रहा
है
पास
वो
इक
जाहिल
के
बैठा
अपनी
हसरत
बहा
रहा
है
देख
"शगफ़"
साहिल
पे
बैठा
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गर
सफ़र
तेरे
साथ
हो
जाए
कितनी
लज़्ज़त
की
बात
हो
जाए
गश्त
का
लुत्फ़
भी
अलग
हो
जब
तेरे
हाथों
में
हाथ
हो
जाए
तेरे
हर
ग़म
को
जज़्ब
कर
लूँ,
गर
तेरी
उँगली
पे
हाथ
हो
जाए
बात
कुछ
भी
नहीं
बस
इतनी
है
उन
सेे
थोड़ी
सी
बात
हो
जाए
तेरा
चेहरा
जो
इतना
दिलकश
है
इतनी
दिलकश
ये
रात
हो
जाए
इस
तरह
तुमको
अपने
पास
रखूँ
एक
तस्वीर
साथ
हो
जाए
"उसका
कहना,
शगफ़
हो
तुम
मेरे
बस"
कहते
कहते
ही
रात
हो
जाए
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Adnan Ali SHAGAF
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सीने
में
तो
काँटे
ही
नहीं
हैं
दिल
में
फिर
ये
चुभन
क्यूँ
है
माना
कि
ख़ुदा
है
साथ
मेरे
फिर
भी
ये
अकेलापन
क्यूँ
है
Adnan Ali SHAGAF
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ख़ुदा
के
दर
से
तुझे
इस
अदास
माँगा
है
कि
हाथ
उठा
के
नहीं
सर
झुका
के
माँगा
है
Adnan Ali SHAGAF
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मैं
तो
कहता
था
बस
सँभल
जाओ
यूँँ
नहीं
था
कि
तुम
बदल
जाओ
मोम
हाथों
में
लेके
बैठा
हूँ
अब
भी
मौक़ा
है
तुम
पिघल
जाओ
हाथ
की
नब्ज़
काट
बैठा
हूँ
ख़ूँ
के
ज़रिए
ही
तुम
निकल
जाओ
मेरी
आँखों
को
आइना
समझो
और
इन
में
ही
आके
ढल
जाओ
अब
ये
आलम
भी
टलने
वाला
है
अब
शगफ़
तुम
भी
याँ
से
टल
जाओ
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Adnan Ali SHAGAF
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