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Saurabh Sharma 'sadaf'
yuñ bhi ham unke nishaane pe nahin aate hain
yuñ bhi ham unke nishaane pe nahin aate hain | यूँँ भी हम उनके निशाने पे नहीं आते हैं
- Saurabh Sharma 'sadaf'
यूँँ
भी
हम
उनके
निशाने
पे
नहीं
आते
हैं
उनके
तेवर
जो
ठिकाने
पे
नहीं
आते
हैं
सुन
मेरे
भाई
अगर
तर्क-ए-त'अल्लुक़
हो
तो
राज़
से
पर्दा
उठाने
पे
नहीं
आते
हैं
गाँव
में
आप
ही
हो
जाते
हैं
सुख
दुख
में
शरीक
शहर
में
लोग
बुलाने
पे
नहीं
आते
हैं
वक़्त
अच्छा
हो
तो
बस
इतना
ही
हो
सकता
है
लोग
औक़ात
दिखाने
पे
नहीं
आते
हैं
- Saurabh Sharma 'sadaf'
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दर्द
में
शिद्दत-ए-एहसास
नहीं
थी
पहले
ज़िंदगी
राम
का
बन-बास
नहीं
थी
पहले
Shakeel Azmi
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हर
दुख
का
है
इलाज,
उसे
देखते
रहो
सबकुछ
भुला
के
आज
उसे
देखते
रहो
देखा
उसे
तो
दिल
ने
ये
बे-साख़्ता
कहा
छोड़ो
ये
काम
काज
उसे
देखते
रहो
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Aslam Rashid
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वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
Zubair Ali Tabish
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हम
आह
भी
करते
हैं
तो
हो
जाते
हैं
बदनाम
वो
क़त्ल
भी
करते
हैं
तो
चर्चा
नहीं
होता
Akbar Allahabadi
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दर्द
ऐसा
नजरअंदाज
नहीं
कर
सकते
जब्त
ऐसा
की
हम
आवाज
नहीं
कर
सकते
बात
तो
तब
थी
कि
तू
छोड़
के
जाता
ही
नहीं
अब
तेरे
मिलने
पे
हम
नाज
नहीं
कर
सकते
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Ismail Raaz
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ज़िन्दगी
पर
लिख
दिया
था
नाम
मैंने
राम
का
और
फिर
दुख
के
समुंदर
पार
सारे
हो
गए
Tanoj Dadhich
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इस
क़दर
जज़्ब
हो
गए
दोनों
दर्द
खेंचूँ
तो
दिल
निकल
आए
Abbas Qamar
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बे-नाम
सा
ये
दर्द
ठहर
क्यूँँ
नहीं
जाता
जो
बीत
गया
है
वो
गुज़र
क्यूँँ
नहीं
जाता
Nida Fazli
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इश्क़
से
तबीअत
ने
ज़ीस्त
का
मज़ा
पाया
दर्द
की
दवा
पाई
दर्द-ए-बे-दवा
पाया
Mirza Ghalib
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यूँँ
दिल
को
तड़पने
का
कुछ
तो
है
सबब
आख़िर
या
दर्द
ने
करवट
ली
या
तुम
ने
इधर
देखा
Jigar Moradabadi
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हर
लड़के
में
एक
ख़राबी
होती
है
उसको
अपना
इश्क़
इबादत
लगता
है
Saurabh Sharma 'sadaf'
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वो
बचपन
या
बुजुर्गों
की
वो
बैठक
भूल
मत
जाना
सुनो
तुम
गाँव
की
मिट्टी
अचानक
भूल
मत
जाना
ये
मुमकिन
है
वो
शायद
आज
तक
मतलब
न
समझी
हो
कहा
था
मैंने
जब
शादी
मुबारक,
भूल
मत
जाना
था
उसका
ध्यान
सारा
मुझको
हाल-ए-दिल
सुनाने
में
सो
अब
कहना
पड़ा
चाय
में
अदरक
भूल
मत
जाना
नवाज़े
जब
ख़ुदा
तुमको
ज़माने
भर
की
दौलत
से
'सदफ़'
मिट्टी
की
वो
छोटी
सी
गुल्लक
भूल
मत
जाना
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Saurabh Sharma 'sadaf'
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उनकी
आँखें
झील
हैं
तो
क्या
करें
डूब
जाएँ
काम
धंधा
छोड़
दें?
Saurabh Sharma 'sadaf'
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तेरे
एहसास
को
ख़ुशबू
बनाते
जो
बस
चलता
तुझे
उर्दू
बनाते
यक़ीनन
इस
से
तो
बेहतर
ही
होती
वो
इक
दुनिया
जो
मैं
और
तू
बनाते
मिटाने
की
कभी
नौबत
न
आती
जो
मेरे
नाम
का
टैटू
बनाते
वो
जिस
में
सारी
दुनिया
डूब
जाए
तेरी
फ़ुर्क़त
में
वो
आँसू
बनाते
इलाही
ता-क़यामत
नाचना
था
सो
मेरी
ख़ाक
से
घुंघरू
बनाते
किसी
दिन
तीरगी
के
कैनवस
पर
तुम्हारी
याद
के
जुगनू
बनाते
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Saurabh Sharma 'sadaf'
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पराई
आग
में
रिश्ता
कहाँ
सँभलता
है
कि
आँधियों
में
दुपट्टा
कहाँ
सँभलता
है
कमी
रही
भी
तो
बेचैनियाँ
नहीं
जाती
बरस
पड़े
भी
तो
पैसा
कहाँ
सँभलता
है
कहानी
कार
तो
किरदार
मार
सकता
है
पर
इतनी
बात
से
क़िस्सा
कहाँ
सँभलता
है
बड़े-बड़ों
को
भी
इज़्ज़त
हज़म
नहीं
होती
बड़े-बड़ों
से
भी
लहजा
कहाँ
सँभलता
है
कभी
कभी
तो
पड़ोसी
सँभाल
लेते
थे
पर
अब
तो
माँ
से
भी
बच्चा
कहाँ
सँभलता
है
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Saurabh Sharma 'sadaf'
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