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Sarvat Husain
jise anjaam tum samjhti ho
jise anjaam tum samjhti ho | जिसे अंजाम तुम समझती हो
- Sarvat Husain
जिसे
अंजाम
तुम
समझती
हो
इब्तिदा
है
किसी
कहानी
की
- Sarvat Husain
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हर
सुब्ह
निकलना
किसी
दीवार-ए-तरब
से
हर
शाम
किसी
मंज़िल-ए-ग़मनाक
पे
होना
Sarvat Husain
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रात
ढलने
के
बाद
क्या
होगा
दिन
निकलने
के
बाद
क्या
होगा
सोचता
हूँ
कि
उस
से
बच
निकलूँ
बच
निकलने
के
बाद
क्या
होगा
ख़्वाब
टूटा
तो
गिर
पड़े
तारे
आँख
मलने
के
बाद
क्या
होगा
रक़्स
में
होगी
एक
परछाईं
दीप
जलने
के
बाद
क्या
होगा
दश्त
छोड़ा
तो
क्या
मिला
'सरवत'
घर
बदलने
के
बाद
क्या
होगा
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Sarvat Husain
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वहीं
पर
मिरा
सीम-तन
भी
तो
है
उसी
रास्ते
में
वतन
भी
तो
है
बुझी
रूह
की
प्यास
लेकिन
सख़ी
मिरे
साथ
मेरा
बदन
भी
तो
है
नहीं
शाम-ए-तीरा
से
मायूस
मैं
बयाबाँ
के
पीछे
चमन
भी
तो
है
मशक़्क़त
भरे
दिन
के
आख़ीर
पर
सितारों
भरी
अंजुमन
भी
तो
है
महकती
दहकती
लहकती
हुई
ये
तन्हाई
बाग़-ए-अदन
भी
तो
है
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दश्त
ले
जाए
कि
घर
ले
जाए
तेरी
आवाज़
जिधर
ले
जाए
अब
यही
सोच
रही
हैं
आँखें
कोई
ता-हद्द-ए-नज़र
ले
जाए
मंज़िलें
बुझ
गईं
चेहरों
की
तरह
अब
जिधर
राहगुज़र
ले
जाए
तेरी
आशुफ़्ता-मिज़ाजी
ऐ
दिल
क्या
ख़बर
कौन
नगर
ले
जाए
साया-ए-अब्र
से
पूछो
'सरवत'
अपने
हमराह
अगर
ले
जाए
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Sarvat Husain
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मौत
के
दरिंदे
में
इक
कशिश
तो
है
'सरवत'
लोग
कुछ
भी
कहते
हों
ख़ुद-कुशी
के
बारे
में
Sarvat Husain
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