कभी तेग़-ए-तेज़ सुपुर्द की कभी तोहफ़ा-ए-गुल-ए-तर दिया

  - Sarvat Husain
कभीतेग़-ए-तेज़सुपुर्दकीकभीतोहफ़ा-ए-गुल-ए-तरदिया
किसीशाह-ज़ादीकेइश्क़नेमेरादिलसितारोंसेभरदिया
येजोरौशनीहैकलाममेंकिबरसरहीहैतमाममें
मुझेसब्रनेयेसमरदियामुझेज़ब्तनेयेहुनरदिया
ज़मींछोड़करनहींजाऊँगानयाशहरएकबसाऊँगा
मेरेबख़्तनेमेरेअहदनेमुझेइख़्तियारअगरदिया
किसीज़ख़्म-ए-ताज़ाकीचाहमेंकहींभूलबैठूँराहमें
किसीनौजवाँकीनिगाहनेजोपयामवक़्त-ए-सहरदिया
मेरेसाथबूद-ओ-नबूदमेंजोधड़करहाहैवजूदमें
इसीदिलनेएकजहानकामुझेरू-शनासतोकरदिया
  - Sarvat Husain
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