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SALIM RAZA REWA
meraa mazhab yahii sikhaata hai
meraa mazhab yahii sikhaata hai | मेरा मज़हब यही सिखाता है
- SALIM RAZA REWA
मेरा
मज़हब
यही
सिखाता
है
सारी
दुनिया
से
मेरा
नाता
है
ज़िन्दगी
कम
है
बाँट
ले
ख़ुशियाँ
दिल
किसी
का
तू
क्यूँँ
दुखाता
है
हर
भटकते
हुए
मुसाफ़िर
को
सीधा
रस्ता
वही
दिखाता
है
दुश्मनों
के
तमाम
चालों
से
मेरा
रहबर
मुझे
बचाता
है
दोस्त
वो
है
जो
मुश्किलों
में
भी
अपने
यारों
के
काम
आता
है
- SALIM RAZA REWA
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इस
तरह
करता
है
हर
शख़्स
सफ़र
अपना
ख़त्म
ख़ुद
को
तस्वीर
में
रखता
है
चला
जाता
है
Sandeep kumar
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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यक़ीन
हो
तो
कोई
रास्ता
निकलता
है
हवा
की
ओट
भी
ले
कर
चराग़
जलता
है
Manzoor Hashmi
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मुसाफ़िरों
से
कहो
अपनी
प्यास
बाँध
रखें
सफ़र
की
रूह
में
सहरा
कोई
उतर
चुका
है
Aziz Nabeel
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मैं
अपने
आप
में
गहरा
उतर
गया
शायद
मिरे
सफ़र
से
अलग
हो
गई
रवानी
मिरी
Abbas Tabish
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हमारे
लोग
अगर
रास्ता
न
पाएँगे
शिलाएँ
जोड़
के
पानी
पे
पुल
बनाएँगे
फिर
एक
बार
मनेगी
अवध
में
दीवाली
फिर
एक
बार
सभी
रौशनी
में
आएँगे
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Amit Jha Rahi
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आवाज़
दे
के
देख
लो
शायद
वो
मिल
ही
जाए
वर्ना
ये
उम्र
भर
का
सफ़र
राएगाँ
तो
है
Muneer Niyazi
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यहाँ
किसी
को
कोई
रास्ता
नहीं
देता
मुझे
गिरा
के
अगर
तुम
सँभल
सको
तो
चलो
Nida Fazli
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मैं
लौटने
के
इरादे
से
जा
रहा
हूँ
मगर
सफ़र
सफ़र
है
मिरा
इंतिज़ार
मत
करना
Sahil Sahri Nainitali
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अभी
से
पाँव
के
छाले
न
देखो
अभी
यारो
सफ़र
की
इब्तिदा
है
Ejaz Rahmani
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दूर
जितना
ही
मुझ
सेे
जाएँगे
मुझको
उतना
क़रीब
पाएँगे
कुछ
न
होगा
तो
आँख
नम
होंगी
दोस्त
बिछड़े
जो
याद
आएँगे
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SALIM RAZA REWA
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मैं
मनाऊँ
तो
भला
कैसे
मनाऊँ
उसको
मेरा
महबूब
तो
बच्चों
सा
मचल
जाता
है
SALIM RAZA REWA
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दिल-ओ-दिमाग़
में
हर
वक़्त
चल
रहा
है
वो
मेरे
ख़यालों
की
हस्ती
कुचल
रहा
है
वो
पटक
पटक
के
निचोड़ा
जो
उसकी
यादों
को
तो
मेरी
आँख
के
रस्ते
निकल
रहा
है
वो
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SALIM RAZA REWA
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तमन्ना
है
सँवर
जाने
से
पहले
तुझे
देखूँ
निखर
जाने
से
पहले
कभी
मुझपर
भी
हो
नज़र-ए-इनायत
मेरी
हस्ती
बिखर
जाने
से
पहले
गुज़रना
है
मुझे
उनकी
गली
से
वज़ू
कर
लूँ
उधर
जाने
से
पहले
तेरे
पहलू
में
ही
निकले
मेरा
दम
यही
ख़्वाहिश
है
मर
जाने
से
पहले
चलो
एक
प्यार
का
पौधा
लगाएँ
बहारों
के
गुज़र
जाने
से
पहले
चलो
इक
दूसरे
में
डूब
जाएँ
उजालों
के
उभर
जाने
से
पहले
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SALIM RAZA REWA
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धूप
में
साया
हो
जैसे
छाँव
का
काकुल-ए-जानाँ
में
यूँँ
आराम
है
SALIM RAZA REWA
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