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Sagar Kaushik
kabhi kahiin jo milo to tum pe main saara ghussa utaar loonga
kabhi kahiin jo milo to tum pe main saara ghussa utaar loonga | कभी कहीं जो मिलो तो तुम पे मैं सारा ग़ुस्सा उतार लूँगा
- Sagar Kaushik
कभी
कहीं
जो
मिलो
तो
तुम
पे
मैं
सारा
ग़ुस्सा
उतार
लूँगा
तुम्हारे
माथे
को
चूम
कर
मैं
तुम्हारा
सदक़ा
उतार
लूँगा
उदास
लम्हों
में
मैं
कभी
भी
तुम्हें
अकेला
न
रहने
दूँगा
मैं
अपनी
ज़ुल्फ़ें
बिगाड़
लूँगा
मैं
अपना
चेहरा
उतार
लूँगा
- Sagar Kaushik
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मुझको
मेरी
जगह
मिली
ही
नइँ
ये
मेरा
युग
मेरी
सदी
ही
नइँ
आज
सब
आँसुओं
ने
धो
डाला
आज
कोई
ग़ज़ल
हुई
ही
नइँ
मेरा
कुत्तों
से
है
बड़ा
नाता
मेरे
कुन्बे
में
आदमी
ही
नइँ
आज
काफ़ी
ख़ुशी
का
दिन
है
और
मुझको
इस
बात
की
ख़ुशी
ही
नइँ
ज़िंदगी
मुझको
है
अज़ीज़
मगर
मुझ
में
अब
ज़िंदगी
बची
ही
नइँ
सब
को
कोई
न
कोई
जल्दी
है
एक
मैं
हूँ
कि
हड़बड़ी
ही
नइँ
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Sagar Kaushik
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अश्क
रुख़सार
तक
नहीं
पहुँचे
दामन-ए-यार
तक
नहीं
पहुँचे
तुझको
कहते
हैं
बे-वफ़ा
वो
जो
तेरे
मेयार
तक
नहीं
पहुँचे
घोंसले
से
गिरे
ज़मीं
पर
जो
अब
तलक
डार
तक
नहीं
पहुँचे
पंखुड़ी
छू
के
लौट
आए
सब
कोई
भी
ख़ार
तक
नहीं
पहुँचे
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Sagar Kaushik
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अक़्ल
का
पर्दा
हटाया
तो
वो
नज़र
आया
तेरी
नज़रों
से
जो
देखा
तो
वो
नज़र
आया
Sagar Kaushik
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यूँँ
तो
मेरा
इश्क़
बहुत
पाकीज़ा
है
लेकिन
मेरी
उम्र
बहकने
वाली
है
Sagar Kaushik
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अब
मुझको
हर
ओर
सुनाई
देता
है
सन्नाटे
का
शोर
सुनाई
देता
है
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