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Ruqayyah Maalik
kitaaben shahr se jungle se phool la ke do
kitaaben shahr se jungle se phool la ke do | किताबें शहरस जंगल से फूल ला के दो
- Ruqayyah Maalik
किताबें
शहरस
जंगल
से
फूल
ला
के
दो
हमारे
कमरे
के
दीवार-ओ-दर
सजा
के
दो
हमारे
ख़्वाब
में
तुम
भी
हो
और
गुलाब
भी
हैं
हमारे
ख़्वाब
में
इक
आइना
लगा
के
दो
ये
मोच
आई
मुझे
आसमाँ
से
गिरने
पर
किसी
ने
मुझ
से
कहा
था
कि
चाँद
ला
के
दो
मुझे
भी
शीश
महल
देखने
की
ख़्वाहिश
है
मुझे
उस
आँख
तलक
रास्ता
बना
के
दो
- Ruqayyah Maalik
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यूँँ
लगे
दोस्त
तिरा
मुझ
से
ख़फ़ा
हो
जाना
जिस
तरह
फूल
से
ख़ुशबू
का
जुदा
हो
जाना
Qateel Shifai
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आप
अपने
से
हम-सुख़न
रहना
हमनशीं
साँस
फूल
जाती
है
Jaun Elia
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तमाम
शहर
की
ख़ातिर
चमन
से
आते
हैं
हमारे
फूल
किसी
के
बदन
से
आते
हैं
Farhat Ehsaas
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फूल
से
लेकर
ये
धनिया
लाने
तक
के
इस
सफ़र
को
मुझको
तेरे
साथ
ही
तय
करने
की
ख़्वाहिश
है
पगली
Harsh saxena
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तुम
सेे
जो
मिला
हूँ
तो
मेरा
हाल
है
बदला
पतझड़
में
भी
जैसे
के
कोई
फूल
खिला
हो
Haider Khan
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ये
जो
है
फूल
हथेली
पे
इसे
फूल
न
जान
मेरा
दिल
जिस्म
से
बाहर
भी
तो
हो
सकता
है
Abbas Tabish
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फोन
भी
आया
तो
शिकवे
के
लिए
फूल
भी
भेजा
तो
मुरझाया
हुआ
Balmohan Pandey
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"उसके
हाथ
में
फूल
है"
मत
कहिए,
कहिए
उसका
हाथ
है
फूल
को
फूल
बनाने
में
Charagh Sharma
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तोहफ़ा,
फूल,
शिकायत,
कुछ
तो
लेकर
जा
इश्क़
से
मिलने
ख़ाली
हाथ
नहीं
जाते
Tanoj Dadhich
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फूल
की
आँख
में
शबनम
क्यूँँ
है
सब
हमारी
ही
ख़ता
हो
जैसे
Bashir Badr
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हमें
पिंजरे
में
पर
भेजे
गए
हैं
ये
तोहफ़े
सोच
कर
भेजे
गए
हैं
तुम्हारे
हिज्र
से
अच्छी
वबा
है
कम
अज़
कम
लोग
घर
भेजे
गए
हैं
ये
किस
वहशत
से
शाख़ें
काँपती
हैं
परिंदे
किस
नगर
भेजे
गए
हैं
दिए
की
लौ
पे
सत्ता
किस
लिए
है
ये
झोंके
किस
के
घर
भेजे
गए
हैं
हम
अब
की
बार
जब
उस
से
मिले
तो
लगा
के
काम
पर
भेजे
गए
हैं
कहाँ
उस
ने
फ़रिश्ते
भेजने
थे
कहाँ
ये
जानवर
भेजे
गए
हैं
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Ruqayyah Maalik
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हमें
पिंजरे
में
पर
भेजे
गए
हैं
ये
तोहफ़े
सोच
कर
भेजे
गए
हैं
Ruqayyah Maalik
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बे-मौत
जान
लेगा
ये
जितना
अजीब
है
दुख
जिस
क़दर
शदीद
है
उतना
अजीब
है
कोई
गली
कहीं
नहीं
राह-ए-फ़रार
की
या
रब
तेरे
ज़हान
का
नक़्शा
अजीब
है
उस
दिल
में
बस
रहे
है
कई
लोग
एक
साथ
हर
आदमी
का
चाँद
पे
जाना
अजीब
है
इक
तो
वो
दिल
दुखाता
है
दिन
में
हज़ार
बार
ऊपर
से
ख़ुश
भी
रहता
है
कितना
अजीब
है
ऐ
शख़्स
कायनात
में
वो
सब
तुम्हारे
नाम
जो
कुछ
जहाँ
कहीं
पे
भी
जितना
अजीब
है
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Ruqayyah Maalik
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उसे
कहो
कि
वो
खिड़की
से
झाँक
ले
इक
बार
वो
दिल
में
रह
नहीं
सकता
तो
फिर
नज़र
में
रहे
Ruqayyah Maalik
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दिल
ने
पहले
पहल
तो
उस
की
कमी
तस्लीम
की
फिर
कहीं
आँखों
ने
अपनी
बेबसी
तस्लीम
की
तुझ
से
मिलते
ही
मुझे
पहली
मोहब्बत
हो
गई
और
मैंने
वो
मोहब्बत
आख़िरी
तस्लीम
की
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