gulon ke rang ubhre ja rahe hain | गुलों के रंग उभरे जा रहे हैं

  - Rakesh Mahadiuree
गुलोंकेरंगउभरेजारहेहैं
परिंदेऔरभीचिल्लारहेहैं
मुहब्बतकोसज़ाबतलारहेहैं
येलड़केइश्क़सेघबरारहेहैं
मुहब्बतक्याहैकोईहमसेेपूछो
दिलोंसेकूचकरकेरहेहैं
मैंउनकीयादमेंखोयाहुआहूँ
ग़ज़लमेंशे'रबढ़तेजारहेहैं
जहाँतर्क-ए-त'अल्लुक़होगयाथा
वोहमकोफिरवहींबुलवारहेहैं
अभीकलहीतोमिलकेरहाहूँ
वोमुझसेेइश्क़फिरफ़रमारहेहैं
मैंसबकुछजानकरनादाँबनाहूँ
वोमुझकोबारहासमझारहेहैं
मैंउनकोदेखकरमुस्कारहाहूँ
वोमुझकोदेखकरजलजारहेहैं
मुहब्बतकरनेकीजल्दीथीजिनको
मुहब्बतकरकेवोपछतारहेहैं
ग़ज़ल'राकेश'सेसुननीहैइनको
मगरयेलोगतोशर्मारहेहैं
  - Rakesh Mahadiuree
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