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Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'
KHvaab hi ne jagaae rakkha hai
KHvaab hi ne jagaae rakkha hai | ख़्वाब ही ने जगाए रक्खा है
- Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'
ख़्वाब
ही
ने
जगाए
रक्खा
है
वर्ना
आदम
तो
सो
चुका
होता
- Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'
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एक
वजह
ये
भी
है
ख़ुदस
ज़्यादा
तुझको
लिखने
की
तेरी
हिमायत
करते
हुए
मैं
मेरे
जैसा
होता
हूँ
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सितम
ये
है
मुझको
न
सुनने
से
पहले
तुम्हीं
बोलते
थे
बता
दो
बता
दो
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ज़िन्दगी
को
अज़िय्यत
मिली
है
एक
तरफ़ा
मोहब्बत
हुई
है
ऐश
फ़रमा
रही
है
फ़रेबी
पाक
चाहत
तो
सूली
चढ़ी
है
एक
लड़का
फ़क़त
इश्क़
में
है
ये
कहानी
किसी
फ़िल्म
सी
है
ग़ैरहाज़िर
रहा
इश्क़
से
मैं
हाज़िरी
अपनी
फिर
भी
लगी
है
लड़
तो
लूँगा
अँधेरे
से
मैं
पर
रौशनी
आँख
पे
ही
पड़ी
है
वक़्त
से
आगे
चलती
थी
वो
जो
वक़्त
से
पहले
दुल्हन
बनी
है
याद
रखना
मेरी
जाँ
तू
गुल
है
आतिश-ए-गुल
में
भी
तू
पली
है
काम
आ
आइने
के
मकीं
तू
जान
पहचान
का
आदमी
है
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चला
आता
मैं
चौखट
पे
तेरी
शायद
कभी
लेकिन
तुझे
तेरे
मकाँ
का
रास्ता
पक्का
नहीं
करना
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ग़लत
था
आइना
ऐसा
नहीं
था
हमीं
ने
ठीक
से
देखा
नहीं
था
ग़नीमत
है
मोहब्बत
आई
मुझ
तक
वगरना
हाथ
कुछ
लगता
नहीं
था
मैं
उसकी
आँखों
में
क्या
देखता
हूँ
मेरा
चेहरा
मेरा
चेहरा
नहीं
था
मुझे
सुनकर
सुनाने
लग
गए
तुम
बताया
था
तुम्हें
पूछा
नहीं
था
परिंदों
इसलिए
आज़ाद
हो
तुम
कि
तुमपे
कोई
भी
पहरा
नहीं
था
भला
क्यूँँ
देखता
मैं
ख़्वाब
तेरा
मुकम्मल
तो
कभी
होना
नहीं
था
ये
मुमकिन
था
कबूतर
लौट
आता
पर
अब
उसका
वो
हम-साया
नहीं
था
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