toot kar aalam-e-ajzaa men bikharte hi rahe | टूट कर आलम-ए-अज्ज़ा में बिखरते ही रहे

  - Rafat Shameem
टूटकरआलम-ए-अज्ज़ामेंबिखरतेहीरहे
नक़्श-ए-ता'मीरजहाँबनकेबिगड़तेहीरहे
अपनेहीवहम-ओ-तज़बज़ुबथेख़राबीकासबब
घरअक़ीदोंकेबसाएतोउजड़तेहीरहे
जानेक्याबातहुईमौसम-ए-गुलमेंअबके
पँखपंछीकेफ़ज़ाओंमेंबिखरतेहीरहे
चंदयादोंकीपनाह-गाहमेंजानेक्यूँँहम
साया-ए-शामकीमानिंदसिमटतेहीरहे
हमनेहररंगसेचेहरेकोसजायालेकिन
अपनीपहचानकेआसारबिगड़तेहीरहे
  - Rafat Shameem
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy