टूटकरआलम-ए-अज्ज़ामेंबिखरतेहीरहे
नक़्श-ए-ता'मीरजहाँबनकेबिगड़तेहीरहे
अपनेहीवहम-ओ-तज़बज़ुबथेख़राबीकासबब
घरअक़ीदोंकेबसाएतोउजड़तेहीरहे
जानेक्याबातहुईमौसम-ए-गुलमेंअबके
पँखपंछीकेफ़ज़ाओंमेंबिखरतेहीरहे
चंदयादोंकीपनाह-गाहमेंजानेक्यूँँहम
साया-ए-शामकीमानिंदसिमटतेहीरहे
हमनेहररंगसेचेहरेकोसजायालेकिन
अपनीपहचानकेआसारबिगड़तेहीरहे