dhhaate hain ab vo zulm-o-sitam kam bahut hi kam | ढाते हैं अब वो ज़ुल्म-ओ-सितम कम बहुत ही कम

  - Qais Jalandhari
ढातेहैंअबवोज़ुल्म-ओ-सितमकमबहुतहीकम
या'नीहैउनकालुत्फ़-ओ-करमकमबहुतहीकम
जिसराहमेंहैंरंज-ओ-अलमकमबहुतहीकम
उठतेहैंउसपेमेरेक़दमकमबहुतहीकम
इससेमुरादयेतोनहींदिलहैमुतमइन
मानाहैमेरीआँखमेंनमकमबहुतहीकम
दोस्तऔरहैतिरादिलऔरहीज़बाँ
अबतुझकोमुँहलगाएँगेहमकमबहुतहीकम
फ़र्द-ए-गुनाहदेखकेयारबसज़ादे
निय्यतमिरीहैइसमेंरक़मकमबहुतहीकम
हक़-गोकीबातबातकोइज़हार-ए-हक़समझ
खाएअगरख़ुदाकीक़समकमबहुतहीकम
रिंदोंकेदमसेशैख़हुआचाँदईदका
आताहैवा'ज़करनेकोकमकमबहुतहीकम
अबफ़ाक़ा-मस्तियोंसेयेआदतसीहोगई
खाताहूँरिज़्क़कीभीक़समकमबहुतहीकम
साक़ीकीचश्म-ए-मस्तकीहैबातहीकुछऔर
हैउसकेआगेबादा-ए-जमकमबहुतहीकम
क़ैसअगरज़मीन-ए-ग़ज़लहोसंगलाख़
चलताहैउसमेंपा-ए-क़लमकमबहुतहीकम
  - Qais Jalandhari
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