kabhi jab apne ghar kii yaad aati hai | कभी जब अपने घर की याद आती है

  - Pravendra Anuragi
कभीजबअपनेघरकीयादआतीहै
परिंदोंकोभीआज़ादीसतातीहै
मुझेवैसेतोकोईग़मनहींहैबस
मुझेहररोज़उसकीयादआतीहै
मुझेहररोज़जबरनजीनापड़ताहै
मिरीयेज़ीस्तग़महीग़मलुटातीहै
उसेइनपत्थरोंसेक्यूँँहोवहशत
वोभीतोख़्वाबशीशेकेसजातीहै
चराग़ोंकोशिकायतहैतोबसइतनी
हवाहरदफ़्अउनकोभूलजातीहै
ग़मोंसेगहरेरिश्तेहोचलेमेरे
ज़ियादाअबख़ुशीमुझकोरुलातीहै
अलगहीबोझहूँइसज़िंदगीपेमैं
येतुर्बतदेखमुझकोमुस्कुरातीहै
अगरबीमारहूँतोरहनेदोमुझको
दवाक्यूँँमेरीचौखटखटखटातीहै
मिटाताहूँवफ़ाकेक़िस्सेपन्नोंसे
मुहब्बतकीसियाहीअबसतातीहै
नज़र-अंदाज़मैंकरहीनहींसकता
उसीकीबाहोंमेंअबनींदआतीहै
ख़मोशीउसकेचेहरेपेनहींसजती
वोअच्छीलगतीहैजबगीतगातीहै
कभीमहताबसचकोरौशनीदेगा
इसीउम्मीदमेंशबबीतजातीहै
  - Pravendra Anuragi
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